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मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का

आर्टिकल/इंटरव्यूमरा हुआ हाथी भी सवा लाख का

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अमित बिश्नोई
कहते हैं मरा हुआ भी हाथी सवा लाख का होता है, कहने का मतलब यहाँ पर ये है कि हाथी मर भी जाय तब भी उसकी कीमत काफी होती है. कुछ यही हालत बहुजन समाज पार्टी की है, इस लोकसभा चुनाव में जब हर कोई गठबंधन गठबंधन खेल रहा है, मायावती अकेले ही मैदान में उतर पड़ी हैं. इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को लोगों ने साइड में करके रख दिया है, ये कहा जा रहा है कि हाथी अब बूढा हो चूका है, लेकिन बात फिर वही जब मारा हुआ हाथी कीमती हो सकता है तो बूढ़े हाथी में कम से कम जान तो होती ही है ऐसे में उसकी हालत मरे हुए हाथी से तो ज़्यादा होगी ही और कुछ नहीं तो इतनी तो ज़रूर होगी कि हम तो डूबे हैं सनम तुमको भी ले डूबेंगे।

गठबंधन के इस दौर में ऐसा क्यों है इसके कई कारण माने जा सकते हैं. आप ऐसा भी कह सकते हैं कि देश के दो बड़े गठबंधनों ने मायावती को उसमें शामिल करने के काबिल नहीं समझा या ये भी कह सकते हैं कि मायावती ने भीड़ में खोने से अच्छा भीड़ से अलग होने को माना। मायावती वैसे भी हमेशा वहीँ पर नज़र आती हैं जहाँ से वो लोगों को नज़र आ सकें। अकेले चुनाव लड़ने का कारण यही हो सकता है. ऐसा नहीं है कि इंडिया गठबंधन ने उनको सिरे से नकारा। शुरुआत में कोशिश भी काफी हुई लेकिन यूपी में इंडिया गठबंधन का जो खाका तैयार हुआ उसमें मायावती फिट ही नहीं बैठ रही थीं, सपा और बसपा में इतनी ज़्यादा कडुवाहट है कि बुआ और बबुआ अब शायद ही साथ मिलकर चुनाव लड़ें, हालाँकि ये राजनीती है, कभी भी कुछ भी हो सकता है, सुबह साथ बैठकर चाय पीने वाला दोपहर में गालियां देता हुआ और शाम को फिर गलबहियां करता हुआ दिखाई देता है. यकीन न हो तो बिहार में नितीश कुमार को देख लो.

इंडिया गठबंधन में मायावती के न जुड़ने से सबसे ज़्यादा ख़ुशी भाजपा को हुई थी. हो भी क्यों न, विपक्षी वोटों के विभाजन का उसे फायदा जो मिलने वाला था. एक तरफ भाजपा जहाँ खुश थी वहीँ कांग्रेस और सपा में चिंता थी. उन्हें ये तो मालूम ही है कि अकेले दम पर बसपा भले ही कोई कमाल नहीं कर पाएगी लेकिन दूसरों को कमाल करने से रोकने का दम तो हाथी में आज भी है. भाजपा इसी बात को लेकर गदगद थी कि मुकाबला अब त्रिकोणीय होगा मगर जैसे जैसे बसपा ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा करनी शुरू की तो इंडिया गठबंधन से ज़्यादा भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें उठने लगीं। आम तौर पर ओवैसी की AIMIM की तरह मायावती की बसपा को भी भाजपा की बी टीम या सहयोगी पार्टी कहा जाता है, अतीत में ये बात नज़र भी आयी कि दोनों ही पार्टियों के उठाये गए क़दमों से भाजपा को फायदा मिला लेकिन इस चुनाव में बसपा के उठाये गए क़दमों से तो कम से कम ऐसा नहीं लगता कि वो भाजपा को किसी भी तरह की कोई रियायत दे रही है, देखा जाय तो बसपा सभी दलों को परेशान करने जा रही है. यहाँ तक वाराणसी, अमेठी और रायबरेली में भी वो वाक ओवर देने के मूड में नहीं है.

दरअसल मायावती ने इस बार अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को अपना चुनावी हथियार बनाया है और अबतक वो इस हथियार का बड़ी होशियारी से इस्तेमाल करती हुई दिखाई दे रही हैं. मायावती ने जब जौनपुर से बाहुबली धनंजय सिंह जो इस समय जेल में बंद हैं उनकी पत्नी श्रीकला को प्रत्याशी घोषित किया तो भाजपा बेचैन हो उठी. पिछले 15 दिनों से ठाकुरों ने योगी तुझसे बैर नहीं, मोदी तेरी खैर नहीं का नारा बुलंद कर रखा है, भाजपा ने जौनपुर से एक ठाकुर उम्मीदवार ही मैदान में उतारा है जो मुंबई से आयतित है, कृपा शंकर सिंह का राजनीतिक सम्बन्ध महाराष्ट्र से रहा है, महाराष्ट्र सरकार में वो मंत्री भी रह चुके हैं, ये अलग बात है कि उनका ताल्लुक जौनपुर से है. ऐसे में एक ठाकुर के सामने दूसरा ठाकुर उम्मीदवार उतारकर मायावती ने किसकी राह दुश्वार की है ये आसानी से पता लगाया जा सकता है. सपा ने यहाँ उन बाबू सिंह कुशवाहा को मैदान में उतारा है जो कभी मायावती के खासमखास हुआ करते थे. बहरहाल जौनपुर की राजनीती, डॉन धनंजय सिंह का वर्चस्व और क्षेत्र की डेमोग्राफी को देखते हुए मायावती ने एक शातिराना चाल चली है जो भाजपा को भारी पड़ने वाली है. हो सकता है कि दो बिल्लियों की लड़ाई में यहाँ बन्दर फायदा उठा जाय.

मायावती ने सिर्फ भाजपा को टेशन दी हो ऐसा बिलकुल नहीं है, बसपा प्रमुख ने इस बारे में अपने सभी विरोधियों के साथ समान व्यवहार किया है. हाथी ने अपनी चाल से सपा और कांग्रेस की राह में भी बाधाएं खड़ी की हैं और कई मुस्लिम बाहुल्य सीटों से मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर सपा और कांग्रेस को परेशानी में डाला है, फिर वो चाहे सहारनपुर की सीट हो या फिर मुरादाबाद की सीट. मायावती के हौसलों की उड़ान तो देखिये, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक चुनावी रैली में उनका कहना कि अगर भाजपा ठीकठाक सीटों के साथ सत्ता में आयी तो वो जाटलैंड का सपना पूरा करेगी। अब ये बात बिलकुल उसी तरह की है कि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। बहरहाल चुनाव के समय नेता कुछ भी बोल सकता है, जैसे कि नितीश कुमार बोल गए कि 400 नहीं 4000 हज़ार पार. अब भले ही उसे स्लिप ऑफ़ टंग कहिये मगर मोदी जी के पैर पकड़कर उन्होंने अपनी श्रद्धा तो जाहिर ही कर दी. बहरहाल बसपा में ऐसा कुछ नहीं है यहाँ तो सामने वाले को अपने जूते उतारने पड़ते हैं। फिलहाल मायावती की शातिराना और हाथी की मस्त चाल से NDA और INDIA दोनों चिंतित और विचलित हैं।

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