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Holi 2023: सांस्कृतिक का महामिलन है कुमाऊंनी होली, रविवार को होगा बेजोड़ समागम

उत्तराखंडHoli 2023: सांस्कृतिक का महामिलन है कुमाऊंनी होली, रविवार को होगा बेजोड़...

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चंपावत। पौष के पहले रविवार से फाल्गुन की कृष्ण पूर्णिमा तक अवधी ब्रज और हिमालयी संस्कृति का अद्भुत महामिलन देवभूमि में दिखता है। काली कुमाऊं (वर्तमान चंपावत) कुमाऊंनी होली पूरे विश्व में विख्यात है।

विशिष्ट और अनूठी है होली

आर्यों के हृदय प्रदेश देवभूमि की कुमाऊंनी होली यूं तो विशिष्ट और अनूठी नहीं है। लेकिन यहां की गायन शैली में ब्रह्मर्षि देश (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के पूरब, पश्चिम और उत्तर का बेजोड़ सांस्कृतिक समागम इसे अनोखा बनाता है। पौष के पहले रविवार से फाल्गुन कृष्ण पूर्णिमा तक अवधी, ब्रज और हिमालयी संस्कृति व भाषाबोली का ऐसा अद्भुत महामिलन कुमाऊं में दिखता है।

शिव भी रंग में रंगने से खुद को रोक नहीं पाए

अवध में रघुनंदन होरी खेलते हैं। ब्रजधाम में कन्हैया तो हिमालयी वादियों में उत्तराखंड के अराध्य कैलासवासी शिव भी फाल्गुन में रंग में सराबोर होने से खुद को रोक नहीं पाते हैं। गिरजापति नंदन गजानन का अद्भुत वंदन होता है।
अवधी में रचीबसी राम की नगरी और ब्रज बोली से ओतपोत कृष्ण मायानगरी से देवाधिदेव की जटाओं से हिलोरी लेती गंगा जमुनी सभ्यता वाले प्रयागराज तथा काशी की राग में लिपटी शब्दयात्रा देवभूमि में पहुंचते ही समूचे उत्तर भारत की मिश्रित गायनशैली का अलौकिक केंद्र बनती है।
खास बात कि सिया राम, राधा कृष्ण, उमा महेश व गणपति के फाल्गुनी बयार में रमते ही शक्ति की प्रतीक मां भगवती का दरबार भक्तिरस से अभिभोर हो उठता है।

आर्यों की अग्निहोत्र परंपरा है होली उत्सव

होली की शुरूआत कुमाऊं में कब हुई, यह शोध का विषय है। मगर धार्मिक कथाओं व लोकगाथाओं की ओर ध्यान लगाएं तो आर्यों की अग्निहोत्र परंपरा होली उत्सव के सदियों पुराना होने की गवाही देती है। ‘सर्वे भवंतु सुखिन:…’ का भाव लिए सामाजिक समरसता, मेलमिलाप और मेलजोल बढ़ाने की यह अनूठी संस्कृति आर्यों की अग्निहोत्र परंपरा का अभिन्न हिस्सा रही है।

बोलियों का सुंदर समावेश

जहां तक उत्तराखंड में कुमाऊंनी होली गायन और उसकी शैली का सवाल है तो अवधी व ब्रज बोली का सुंदर समावेश इसके इतिहास को रोचक बनाता है। काली कुमाऊं (वर्तमान चंपावत) कुमाऊंनी होली गायन का मुख्य प्रसार केंद्र रहा है।
णों में होती है। मसलन, पहले दो चरण भक्तिरस प्रधान तो तीसरी खड़ी होली में भक्ति व प्रेमरस के साथ श्रृंगारिक हो जाती है। कुमाऊंनी होली गायनशैली में राग भैरवी, ब्रजधाम में रचाबसा धमार, पीलू, बागेश्री, जैजवंती, खमाज आदि रागों की प्रधानता रहती है। खास बात कि बढ़ते प्रहर के अनुरूप रागों का अनुसरण करने की परंपरा है।

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