गढ़वाल-कुमाऊं की साझी सांस्कृतिक और आध्यत्मिक विरासत है माँ नंदा देवी मंदिर

समुद्र तल से करीब 7816 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर चंद वंश की इष्ट देवी के रूप में पूजा जाता है।  करीब एक हजार साल पुराने इतिहास को अपने आप में समेटे इस मंदिर को बुराई के विनाशक के रूप में माना जाता है।

मेले में माँ नंदा और सुनंदा की मूर्ति को लेकर अलग ही मान्यता है. जिसमे मेले में कदली स्तम्भ से दो भव्य देवी प्रतिमायें बनायी जाती हैं. षष्ठी के दिन पुजारी गोधूली के समय चन्दन, अक्षत एवम् पूजन का सामान तथा लाल एवं श्वेत वस्त्र लेकर केले के झुरमुटों के पास जाते है।

पौराणिक मेला भक्तो के अहम

धूप-दीप जलाकर पूजन के बाद अक्षत मुट्ठी में लेकर कदली स्तम्भ की और फेंके जाते हैं. जो स्तम्भ पहले हिलता है उसे देवी नन्दा बनाया जाता है जबकि दूसरे को सुनन्दा तथा तीसरे से देवी शक्तियों के हाथ-पैर बनाए जाते हैं।

परंपरा के अनुसार रात में चंदवंशीय प्रतिनिधि ही मुख्य पूजा पूरी करते हैं.नवमी के दिन माँ नंदा और सुनंदा को डोलो में बिठाकर शोभायात्रा निकाली जाती है।

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