क्या सियासी रंग दिखाएगी शिवपाल-आज़म की जुगलबंदी?

उत्तर प्रदेशक्या सियासी रंग दिखाएगी शिवपाल-आज़म की जुगलबंदी?

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अखिलेश के खिलाफ बग़ावती बयानात देने वाले जसवंतनगर सीट से सपा विधायक और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल यादव से आज जब उनके भाजपा में जाने की बात पर सवाल किया गया तो उनका जवाब था “अभी मैं आज़म भाई के साथ हूँ”. शिवपाल का यह बयान वैसे तो पत्रकार एक सवाल पर एक नेता की आम प्रतिक्रिया थी मगर इस प्रतिक्रिया के अर्थ बहुत गहरे हैं. शिवपाल ने साथ ही यह भी कहा कि हम लोग जो भी फैसला लेंगे उसे जल्द ही बताएँगे।

बता दें कि शिवपाल आज आज़म खान से मिलने सीतापुर जेल गए थे और दोनों के बीच काफी लम्बी बात हुई। इस पूर्व घोषित मुलाकात पर मीडिया की पहले से नज़रें थीं इसलिए भेंटवार्ता के बाद सियासी कयासों का दौर भी चलने लगा. टीवी चैनलों में तरह तरह की कहानियां चलने लगीं, चर्चाएं होने लगीं। 

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लेकिन सवाल यह उठता है कि समाजवादी पार्टी के यह दो पुराने नेता क्या फैसला लेंगे? दोनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही रही, क्या सियासी हलकों में नए मोर्चे की जो बातें गश्त कर रही हैं वह सही हैं, क्या शिवपाल का इन दिनों भाजपा प्रेम सिर्फ दिखावा है, ख़बरों में रहने का एक सियासी दांव है जिसकी आड़ में कोई और कहानी बुनी जा रही है। 

आज़म खान को लेकर शिवपाल का नेता जी पर हमला तो किसी बड़ी कहानी के कथानक के संकेत दे रहा है, यह पहला मौका है जब शिवपाल ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ ज़बान खोली है। पिछले पांच साल से ज़्यादा समय बीत गया, यादव फैमिली में खूब घमासान हुआ, सपा को नुक्सान हुआ, आज भी अखिलेश यादव के शिवपाल की सास बहू जैसी नोकझोंक जारी है। अभी बीते दो दिनों में दोनों के बीच जमकर तकरार हुई, भतीजे ने चाचा के भाजपा से संपर्कों पर कहा कि जो भाजपा के करीब उसकी समाजवादी पार्टी में जगह नहीं, वहीँ चाचा भी कहाँ चूकने वाले थे, पलटवार करते हुए कहा कि मुझे विधानमंडल दल से निकाल क्यों नहीं देते, मैं तो समाजवादी पार्टी का विधायक हूँ, मगर इस सारी तू तू मैं मैं के बीच मजाल है कि बड़े भाई के खिलाफ छोटे भ्राता के मुंह से कुछ निकला हो। 

शिवपाल को सपा से दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया गया मगर शिवपाल ने खून के घूँट पीकर नेता जी की खड़ाऊँ के साथ नई पार्टी बना ली। मुलायम सिंह ने भी समय समय पर शिवपाल के समर्थन में बयान दिए मगर पिछले कुछ महीनों से चाचा भतीजे के बीच बढ़ती चकचक में मुलायम ने चुप्पी साध ली, इसे भी एक तरह से शिवपाल के खिलाफ अखिलेश के बर्ताव को मुलायम का समर्थन माना गया। 

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शिवपाल को भी लग गया कि अब नेता जी का आशीर्वाद उनके साथ नहीं, शायद इसीलिए दबी ज़बान में ही सही आज़म खान की रिहाई को लेकर शिवपाल ने मुलायम को भी कटघरे में खड़ा ही कर दिया। अखिलेश यादव के खिलाफ वैसे भी पिछले कुछ दिनों मुस्लिम विरोधी होने का परसेप्शन गढ़ा जा रहा है। समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया को मुस्लिम वोट बैंक से दूर करना अचानक नहीं हुआ, यह बड़ी दूर की चाल मालूम पड़ती है, वरना जिस पार्टी में 34-35 मुस्लिम विधायक जीतकर आये हों अचानक वह मुस्लिम विरोधी कैसे हो गयी।

 समय के इसका सच भी सामने आएगा, फ़िलहाल तो शिवपाल और आज़म का सच सामने दिख रहा है जो अगर वाकई में सच हो गया तो अखिलेश यादव के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी करेगा। हालाँकि आज़म खान या उनके विधायक पुत्र अब्दुल्लाह आज़म ने इस पूरे मामले में न इंकार किया है और न इकरार। इसलिए इंकार न करने को अगर इक़रार मान लिया जाय तो सियासी तौर से कुछ गलत न होगा।

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