गुजरात दंगों के चर्चित बिलकीस बानो बानो केस के दोषी एकबार फिर जेल में नज़र आएंगे। देश की सर्वोच्च अदालत ने आज इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए गुजरात सरकार को बहुत बड़ा झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो से बलात्कार, उसके परिवार की हत्या में शामिल 11 दोषियों को सजा में छूट देने के गुजरात सरकार के फैसले को रद्द किया। बता दें कि 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकीस से रेप और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 11 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी थी. लेकिन 2022 में गुजरात सरकार ने समय से पहले इन दोषियों की रिहाई को मंज़ूरी दे दी थी.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने 11 दिन की सुनवाई के बाद 11 दोषियों की सजा में छूट को चुनौती देने संबंधी याचिकाओं पर पिछले साल 12 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही केंद्र और गुजरात सरकार को 16 अक्टूबर तक सभी दोषियों की सजा में छूट संबंधी मूल रिकॉर्ड जमा करने का निर्देश दिया था।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल सितंबर में मामले की सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार से पूछा था कि क्या दोषियों को माफी मांगने का उसे मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले की सुनवाई के दौरान कहा था कि राज्य सरकारों को दोषियों को सजा में छूट देने में ‘‘चयनात्मक रवैया’’ नहीं अपनाना चाहिए। शीर्ष अदालत का मानना है कि 13 मई 2022 का फैसला अदालत के साथ “धोखाधड़ी करके” और भौतिक तथ्यों को छिपाकर प्राप्त किया गया था। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि दोषियों की सजा माफी का आदेश पारित करने के लिए गुजरात नहीं बल्कि महाराष्ट्र सरकार सक्षम है। इस मामले में बिलकिस की याचिका के साथ ही माकपा नेता सुभाषिनी अली, स्वतंत्र पत्रकार रेवती लाल और लखनऊ यूनिवर्सिटी की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा समेत कई लोगों ने PIL दायर कर सजा में छूट को चैलेंज किया है।

