मिर्जापुर द मूवी: हम पब्लिक का नहीं, पब्लिक हमारा इंतजार कर रही थी

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पवन शर्मा

अखिरकार Mirzapur: The Movie एक लंबे अर्से बाद बड़े पर्दे पर आ ही गई। जो लोग मुन्ना भईया को अमर मानते थे आज उनकी वो बात भी सच साबित हो गई।

कहते हैं पूर्वांचल की किस्मत मिर्जापुर तय करता है, पर इस बार खेल अलग है। इस बार दर्शक मिर्जापुर की किस्मत तय करेंगे। कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी), गुड्डू पंडित (अली फज़ल), बबलू पंडित इस बार (जितेंद्र कुमार) और मुन्ना भैया (दिव्येंदु शर्मा) ये वो नगीने हैं जो इस फिल्म को एक शानदार जौहरी की तरह दर्शकों के बीच पेश करते हैं। जैसलमेर से ड्रग माफिया का खतरनाक खिलाड़ी बब्बन यादव (रवि किशन) मिर्जापुर में दस्तक देता है और उसकी नजर सीधे गद्दी पर है और उसका साथ देते हैं कालीन भैया के ही कुछ तथाकथित अपने।

इस बार सवाल गद्दी बचाने का गद्दी पर राज करने का गद्दी की ताकत दिखाने का और यह बताने का है कि मिर्जापुर का बाहुबली सिर्फ एक ही है और एक ही रहेगा।

फिल्म का फर्स्ट हाफ स्टोरी को बिल्ड करने, किरदारों को सटीक तरह से बैठाने के चक्कर में थोड़ा लंबा सा फील हो रहा है तो यही सवाल मन में आता है कि क्या आखिर इसकी जरूरत थी?। लेकिन किरदारों और कहानी को स्थापित करने के बाद जैसे ही फिल्म सेकंड हाफ में पहुंचती है, फिल्म अपने पीक पर पहुंच जाती है और दुगना मजा देती है।

जिन लोगों ने मिर्जापुर सीरीज का खास तौर पर पार्ट वन देखा है उन्हें इस मूवी में वो भाषाएं जिसके लिए वो मिर्जापुर को जानते थे, वो कुछ इंटीमेट सीन जो इस वेब सीरीज का एक हिस्सा से बन गए थे जरूर कम लगेंगे और ये बनता भी था क्योंकि सीरीज ओटीटी पर आई थी और यह मूवी थिएटर में आ रही है तो सीबीएफसी का कट लगाना वाजिब था। पर डार्क कॉमेडी और डायलॉग्स अब भी अपना असर बनाए रखते हैं। जब जब स्क्रीन पर मुन्ना भैया गुड्डू पंडित आमने सामने होते हैं, तब तब फिल्म एक अलग नस्टॉल्जिया हिट कराती है।

सेकंड हाफ मे एक कार-चेज सीक्वेंस सीक्वेंस है जो बहुत ही मजेदार अंदाज में पेश किया गया है, वो यह दर्शाता है कि जब जब गुड्डू पंडित, मुन्ना भैया आमने सामने होते हैं तब दर्शकों को मिर्जापुर का असली मजा मिलता है।

संगीत की बात की जाए, तो इस फिल्म में संगीत की कोई जगह नहीं बनती थी, फिर भी दो ट्रैक डाले गए हैं और एक बिल्कुल अंत में बहुत ही फेमस गाना फिल्म के अंत को जस्टिफाई करने के लिए डाला गया है।

फिल्म में अदाकारी की बात की जाए तो सभी किरदारों ने अपना किरदार बखूबी निभाया है। बबलू त्रिपाठी की कास्टिंग में जितेंद्र अच्छे लगे हैं पर कहीं न कहीं विक्रांत मैसी की कमी खलती है। गुड्डू भैया के अंदाज में अली फजल बिल्कुल वैसे ही खुद को पेश करते हैं जैसा उन्होंने वेब सीरीज में पेश कराया है। मुन्ना भैया फिल्म की जान है वो क्यों अमर है वो इस फिल्म में दर्शाया गया है। कालीन भैया के रूप में पंकज त्रिपाठी ने फिल्म में सधे हुए डायलॉग बोलते हुए अपनी सादगी खामोशी से पिक्चर को वो एक शांत माहौल दिया है, जिसकी कहीं कहीं जरूरत पड़ती है। फिल्म का सरप्राइज पैकेज है रवि किशन, जिन्होंने बब्बन की भूमिका में फिल्म में 4 चांद लगा दिए है और उन्हें स्क्रीन टाइम भी काफी अच्छा खासा दिया गया है।

फिल्म के कई डायलॉग थिएटर में सीटीओ और तालियों की गड़गड़ाहट डिजर्व करते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही शानदार है और यह ये बताता भी है कि फिल्म का दूसरा पार्ट जरूर बनेगा। फिल्म एक पूरी तरह से मास अपील वाली नजर आती है और यह उन सभी दर्शकों को भाएगी, जिन्हें मिर्जापुर सीरीज भाई थी या जिन्हें क्राइम या यूपी का ठेठ देसी अंदाज पसंद है, मेरी तरफ सिर्फ फिल्म को 3 एंड हाफ स्टार्सl

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