कर्नाटक हिजाब विवाद को लेकर मंगलवार को भी सुप्रीम कोर्ट में ज़ोरदार बहस सुनने को मिली. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जहा यह साबित करने का प्रयास किया कि हिजाब कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है. वहीँ याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे ने हिजाब को गरिमा का प्रतीक बताते हुए कहा कि मुस्लिम महिला हिजाब में उसी तरह गरिमापूर्ण दिखती हैं जैसे एक हिंदू महिला साड़ी से सिर ढककर गरिमापूर्ण दिखती हैं. इससे न तो किसी की शांति भंग होती है और न ही किसी की सुरक्षा को कोई खतरा .
दुष्यंत दवे ने सवाल किया कि ऐसा क्यों है कि अचानक 75 साल बाद एक राज्य ने इस प्रकार का प्रतिबंध लगाने के बारे में सोचा? उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा चौंकाने वाला फैसला था जिसके लिए राज्य के पास कोई न्यायसंगत कारण नहीं था. याचिकाकर्ता के वकील दवे ने बुल्ली बाई सुल्ली डील्स का हवाला देते हुए कहा कि आप उन ऐप्स को देखिए जिनके माध्यम से वर्चुअल दुनिया में बड़ी संख्या में मुसलमान औरतों को बिक्री के लिए रखा गया था. दवे ने पूछा ऐसा क्यों हुआ ?
जस्टिस गुप्ता गुप्ता की इस बात पर कि कर्नाटक के बारे में बताएं? दवे ने कहा कि कर्नाटक में अल्पसंख्यक समुदाय को कई बार टारगेट किया गया है. इसपर सॉलिसीटर जनरल ने ऐतराज जताते हुए कहा कि आप कानून पर दलील रखें. दवे ने फिर कहा कि हम एक समुदाय विशेष के मन में डर नहीं बना सकते। कर्नाटक सरकार का आदेश असंवैधानिक है और सुप्रीम कोर्ट को कर्नाटक हाई कोर्ट के इस आदेश को फ़ौरन रद्द करना चाहिए. हिजाब मामले में बुधवार को फिर सुनवाई होने वाली है.

