देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2022 – 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही यहां पर राजनीतिक उठापटक और खींचतान का सिलसिला जारी रहा है। दल कांग्रेस हो या फिर भाजपा। दोनों में आज भी यह परंपरा कायम है। भाजपा की अपेक्षा राजनैतिक उठापटक का यह सिलसिला कांग्रेस में अधिक देखा जाता रहा है। जिस समय राज्य बना उस समय राज्य के पहले मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी बने थे। राजनैतिक उठापटक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य बने 21 साल हो चुके हैंं और इन 21 सालों में राज्य को 13 मुख्यमंत्री मिल चुके हैं। यानी जनता 13 मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल देख चुकी है। सरकार भाजपा की हो या फिर कांग्रेस की। पांच साल के सरकार कार्यकाल में दोनों ही दलों ने अपने मुख्यमंत्रियों को कई बार बदला है। दलों के बीच हुई उठापटक का खामियाजा यहां की जनता को भुगतना पड़ता है। अब जबकि 2022 में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं तो ऐसे में एक बार फिर से कांग्रेस और भाजपा के बीच उठापटक का दौर जारी है। दोनों ही दलों में खेमे बंटे हुए हैं और राजनैतिक गुटबाजी चरम पर है। इस गुटबाजी के बीच जो चुनाव जीतने में सफल हुआ उसी दल का नेता इस बार राज्य के 14वें मुख्यमंत्री पद की शपथ लेगा।
लेकिन उसके लिए राह इस बार उतनी आसान नहीं होगी। इन 21 सालों जब राज्य को मिले 13 मुख्यमंत्रियों की कहानी ही अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि पहाड के भीतर राजनैतिक खींचतान और गुटबाजी का असर कितना गहरा और चरम पर है। इस गुटबाजी की शुरूआत होती है उत्तराखंड प्रदेश के बनने के समय से। यानी वर्ष 2000 से। उसके बाद से लेकर अब तक मात्र एक ऐसा मुख्यमंत्री इस राज्य को मिला जिसने अपना मुख्यमंत्रित्व काल पूरा किया। लेकिन गुटबाजी ने उनको कार्य करना भी भारी कर दिया था। लेकिन गांधी परिवार से तिवारी की नजदीकियों की बदौलत ही वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाए। उस दौरान नारायण दत्त तिवारी के लिए मुसीबत बने थे हरीश रावत। कांग्रेस नेतृत्व पर इन दिनों अपनी अनदेखी का आरोप लगाने वाले हरीश रावत उन दिनों में युवा नेता हुआ करते थे। तिवारी सरकार से उनकी हमेशा खटपट रहती थी। हरीश रावत तिवारी के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में कई बार तिवारी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई और मोर्चा खोलते रहते थे।
कई बार तो मामला इतना बढ़ जाता था कि तिवारी और हरीश रावत दोनों ही दिल्ली तलब कर लिए जाते थे। हरीश रावत ने नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री होते हुए उन्हें कभी चैन की नींद नहीं सोने दिया। एक समय ऐसा भी आया जब दोनों दिग्गजों के बीच सामंजस्य बैठाना हाईकमान के लिए भारी हो गया। प्रदेश की राजनीति में उस दौर में जो गुट आपस में भिड़ते थे। उसमें से एक नारायण दत्त तिवारी का और दूसरा हरीश रावत का होता था। इस भिड़ंत में एनडी तिवारी हमेशा हरीश रावत पर भारी पड़ते रहे। 2002 में जब चुनाव हुए उस समय हरीश रावत प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए होते लेकिन यहां भी हरीश रावत के ऊपर एनडी तिवारी भारी पड़े और हरीश की लहलहा रही राजनैतिक फसल को उन्होंने काट लिया और प्रदेश के मुख्यमंत्री बन बैठे।
रावत 80 के दशक में तीन बार सांसद बने। लेकिन तिवारी के समर्थक सांसद ब्राहमदत्त को ही केंद्र में मंत्री पद मिल सका। हरीश रावत से मिली चुनौतियों से पार पाने के लिए ही एनडी तिवारी यशपाल आर्य को लाए और उनको आगे बढ़ाया। आज इस अपनी राजनैतिक खीचंतान और प्रतिद्वंद्विता में इतने साल बाद सिर्फ मोहरे बदले हैं। लेकिन परंपरा आज भी वहीं चली आ रही है। इसी का नतीजा दलों को उठाना पड़ रहा है और चुनाव निकालना भारी पड़ रहा है।

