मेरठ। यूपी चुनाव – सपा रालोद गठबंधन के लिए टिकट बंटवारे का फार्मूला जी का जंजाल बन गया है। मेरठ सहित कई जिलों में टिकट बंटवारे से जहां जाटों में रालोद के खिलाफ नाराजगी हैं। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम नेताओं में सपा के खिलाफ आक्रोश है। खासकर मेरठ और मुजफ्फरनगर जिले में यह आक्रोश सपा रालोद गठबंधन को नुकसान पहुंचा सकता है। सपा रालोद गठबंधन के लिए उसका दाव कहीं उल्टा न पड़ जाए। टिकट बंटवारे के बाद गठबंधन के लिए अब समीकरण बदल रहे हैं।
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मुजफ्फरनगर जिले में कुल 6 विधानसभाएं आती हैं। इनमें से एक में भी गठबंधन ने वादे के मुताबिक मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। जिससे मुस्लिम समाज में नाराजगी है। माना जा रहा है कि जाट बेल्ट होने के कारण यहां पर सभी सीटों पर वोटों के समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही गठबंधन ने उम्मीदवारों की घोषणा की थी। बता दे कि मुजफ्फरनगर जिले में 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने विपक्षियों का सूपड़ा साफ कर दिया था। 2017 में भाजपा पूरे पश्चिमी उप्र में ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण जीती थी। इस बार भी भाजपा अपनी 2017 की नीति पर चल रही है। भाजपा की काट करने के लिए ही गठबंधन ने प्रत्याशियों का चयन किया।
लेकिन भाजपा की काट करने के लिए अपनाई गई ये रणनीति अब सपा और रालोद के लिए गले की फांस बनती दिखाई दे रही है। एक तरफ जहां अल्पसंख्यक नेता दोनों दलों से नाराज हो गए हैं। वहीं दूसरी ओर टिकट न मिलने से कुछ अपनी पार्टी के भी नेता बागी हो चुके हैं। ये बागी नेता चुनाव में जरूर गठबंधन प्रत्याशी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बताया जाता है कि भाजपा इसका लाभ उठाने की फिराक में है। इस कारण से नाराज नेताओं को हवा देकर गठबंधन उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचाने का काम कर रही है। वहीं बात अन्य दलों की करें तो इस बार बसपा ने तीन और कांग्रेस ने दो मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है।
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जिले में 42 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। 2017 के चुनाव में सपा ने एक और बसपा ने तीन मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट दिया था। उसके बावजूद भी भाजपा की आंधी में ये सभी उड़ गए थे। मुकाबला इस बार बड़ा दिलचस्प है। देखना है कि उम्मीदवारों को मैदान में उतारे बिना मुस्लिम वोटों का रूख अपनी ओर मोड़ने में सपा रालोद गठबंधन कैसे कामयाब होता है।

