सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा स्थित शाही ईदगाह मस्जिद में किसी भी तरह के सर्वे पर रोक लगा दी है. हाई कोर्ट ने मस्जिद में सर्वे का आदेश दिया था जिसपर मुस्लिम पक्ष ने शीर्ष अदालत से कोर्ट कमिश्नर सर्वे पर रोक लगाने की मांग की थी. मुस्लिम पक्ष के वकील तस्नीम अहमदी ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि जहां किसी सिविल मुकदमे की स्थिरता पर सवाल उठाया जाता है उस बुनियाद पर अंतरिम राहत देने का फैसला लेने से पहले ट्रायल कोर्ट को कम से कम मुकदमे को ज़रूर सुनना चाहिए.
उनके मुताबिक मुकदमे के बारे में प्रथम दृष्टया संतुष्टि होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी पहलु का मामला बताते हुए कहा कि मुस्लिम पक्ष के आवेदन पर नोटिस जारी कर रहे हैं. बता दें कि मथुरा में 13.37 एकड़ जमीन पर विवाद चल रहा है. 11 एकड़ पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर का कब्ज़ा है वहीँ 2.37 एकड़ जमीन पर शाही ईदगाह मस्जिद का कब्ज़ा है. 1669-70 में मुग़ल शासक औरंगजेब ने शाही ईदगाह का निर्माण कराया था. ऐसा दावा किया जाता है कि औरंगज़ेब ने श्रीकृष्ण जन्मस्थली पर बने प्राचीन केशवनाथ मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया था.
1951 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट ने 13.37 एकड़ भूमि अधिग्रहित की थी. 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ-शाही ईदगाह कमेटी में समझौता हुआ था. इस समझौते के तहत शाही ईदगाह का मैनेजमेंट मुस्लिमों को सौंपा गया और मुस्लिमों को मंदिर परिसर खाली करने के लिए कहा गया. मंदिर-मस्जिद के बीच दीवार बनाई गयी ताकि दोनों धर्मों की पूजा अर्चना में विघ्न न पड़े . ये तय हुआ कि मस्जिद में मंदिर की तरफ कोई खिड़की भी नहीं होगी. अब याचिकाकर्ता का दावा है कि 1968 का समझौता धोखाधड़ी है और उसे रद्द करने की मांग की गई.
याचिका में शाही ईदगाह की जमीन हिंदू पक्ष को देने की मांग की गई थी. हिंदू पक्ष दावा करता है कि औरंगजेब ने 1670 में मंदिर तोड़कर अवैध तरीके से कब्जा करके ईदगाह बनाई है. हिंदू धर्म के प्रतीकों, मंदिर के खंभों को नुकसान पहुँचाया गया और हिंदुओं को पूजा करने से रोका गया. वहीं मुस्लिम पक्ष का दावा है कि इतिहास में मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के कोई सबूत नहीं हैं और तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश किया जा रहा है. मुस्लिम पक्ष का कहना है की 1968 के समझौते पर मंदिर ट्रस्ट की आपत्ति नहीं है.

