Special Story: क्या हुक्म है मेरे आक़ा

आर्टिकल/इंटरव्यूSpecial Story: क्या हुक्म है मेरे आक़ा

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अमित बिश्‍नोई
 

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अंततः कांग्रेस पार्टी के लिए वह जिन्न बनने की हामी भर ली है जो उसकी ख्वाहिशों को पूरा कर सकता है, अगर ख़बरों की माने तो बस औपचारिकता भर बाकी रह गयी है. कांग्रेस और पीके दोनों ही एक दूसरे के साथ लम्बी पारी खेलना चाहते हैं और इस बात के लिए दोनों के बीच अंडरस्टैंडिंग भी हो चुकी। प्रशांत किशोर ने इस लम्बी पारी के लिए एक रोड मैप भी तैयार कर लिया है जिसका प्रेजेंटेशन उन्होंने एक हाई लेवल मीटिंग में पार्टी आला कमान और दूसरे  बड़े नेताओं के सामने पेश किया है और उसी के बाद कांग्रेस पार्टी ने उन्हें पार्टी में आने का एक औपचारिक प्रस्ताव भी पेश कर दिया है. 

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दरअसल स्थितियां अब कुछ ऐसी बन चुकी हैं कि दोनों को ही एक दूसरे की ज़रुरत है. कांग्रेस पार्टी अपनी खोई हुई साख वापस पाने की लड़ाई लड़ रही है, उसे एक ऐसे चाणक्य की सख्त ज़रुरत है जो अपनी रणनीतियों से कांग्रेस को दोबारा भाजपा के सामने खड़ा कर सके. पीके का साथ लेकर कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है, हाँ पाने को बहुत कुछ ज़रूर है. किसी कांग्रेसी समर्थक ने इस मामले में बड़ी सटीक टिप्पणी की थी कि प्रशांत किशोर के बारे में इतना निगेटिव न सोचो कांग्रेसियों, कामयाब हो गया तो कामराज बनेगा और नाकाम हुआ तो शरद पवार। 

प्रशांत किशोर को लेकर शीर्ष नेतृत्व को अगर छोड़ दें तो पार्टी के दूसरे बड़े नेता काफी सशंकित हैं. शंकाओं की अपनी वजहें हैं लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस के सामने मोदी का मुकाबला करने के लिए विकल्प क्या है? इसलिए प्रशांत किशोर को अपनाने में हर्ज क्या है? यह वही प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने मोदी को ब्रांड बनाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया, तो जो यह काम एक बार कर सकता है, दोबारा भी तो कर सकता है? या कम से कम उसके आस पास तक तो पहुँच सकता है। 

अपनी चुनावी रणनीतियों का लोहा तो प्रशांत किशोर कई बार मनवा चुके हैं इसलिए अब अगर उनकी कोई राजनीतिक इच्छा जगी है तो इसमें हर्ज क्या है. वह अपनी उस राजनीतिक इच्छा को पूरा करने के लिए और ज़्यादा गंभीरता से, और ज़्यादा सधी हुई रणनीति से काम करेंगे। भाजपा में कैसे काम होता है इसका उन्हें भरपूर अनुभव है, यह पीके ही हैं जिन्होंने चाय पर चर्चा कराकर उसे चुनावी हथियार बना दिया। ऐसा अमोघ अस्त्र जिसका मोदी जी आज भी समय समय पर उपयोग करते हैं।  पीके को भाजपा के चुनावी दावों की काट भलीभांति मालूम है. पश्चिम बंगाल के चुनाव में प्रशांत किशोर की टीम ने भाजपा के तूफ़ान का जिस मज़बूती से मुकाबला किया, वह अद्भुत है।  दीदी ने भी ऐसे परिणामों के बारे में नहीं सोचा होगा।

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सबसे बड़ी बात तो यह कि प्रशांत किशोर भी अब सलाहकार बनते बनते थक चुके हैं, बंगाल चुनाव के समय कहा भी था कि यह मेरा आखरी काम है. पीके भी सोचते होंगे कि जब हम दूसरे को किंग बना सकते हैं तो खुद के लिए क्यों न वह काम करें और उसके लिए उन्हें एक ऐसे राजनीतिक प्लेटफॉर्म की ज़रुरत है जिसको बुनियाद बनाकर वह स्वयं को स्थापित कर सकें और पीके की इसी मंशा को शायद पुराने कांग्रेसी भांप रहे हैं. लेकिन बात फिर वही विकल्प की आती है. कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है. कांग्रेस पार्टी को इसे गंभीरता से सोचना होगा, उसे वाकई PK जैसे एक ऐसे जिन्न की ज़रुरत है जो कह सके “क्या हुक्म है मेरे आक़ा” और उसकी ख्वाहिशों को पूरा कर सके।

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