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शूद्रों की राजनीति

आर्टिकल/इंटरव्यूशूद्रों की राजनीति

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अमित बिश्‍नोई

2024 में लोकसभा चुनाव हैं, मोदी जी को तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के लिए भाजपा ने ज़ोरशोर से तैयारियां शुरू दी हैं, देश की हर रियासत में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के दौरे लगातार जारी हैं, उन राज्यों में भी जहाँ इसी वर्ष विधानसभा चुनाव हैं और जहाँ नहीं भी हैं. उत्तर प्रदेश वो राज्य है जिसकी वजह से ही मोदी जी को दो बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला है और अगर तीसरी बार उन्हें मौका मिलता है तो यही उत्तर प्रदेश ही उनकी मदद करेगा। ये सही है कि प्रदेश में भी भाजपा की सरकार है लेकिन 2019 से अगर तुलना करें तो इस बार यहाँ हालात थोड़े बदले हुए हैं, राजनीति की दिशा भी थोड़ी बदली हुई है या फिर बदलती हुई नज़र आ रही है.

भाजपा के लिए यूँ तो हिंदुत्व का मुद्दा पूरे देश में प्राथमिकता पर रहता है लेकिन हिंदी प्रदेशों, विशेषकर उत्तर प्रदेश में प्राथमिकता से भी बढ़कर रहता है. इसबार भी भाजपा शुरुआत तो विकास से ही करेगी लेकिन आगे बढ़ते बढ़ते वो वापस अपने पुराने मुद्दे पर ही आएगी। लेकिन इसबार प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के हिंदुत्व के मुद्दे को इसी मुद्दे के साथ घेरने की तैयारी कर रही है और वो मुद्दा है जातीय जनगणना, जिसका हिंदुत्व के मुद्दे से अप्रत्यक्ष सम्बन्ध है. दरअसल हिंदुत्व के मुद्दे को भाजपा के पक्ष में करने में उन्हीं समुदायों की अग्रणी भूमिका रहती है जिनकी पैरवी इन दिनों अखिलेश यादव और उनकी पार्टी कर रही है.

बजट सेशन में मुख्यमंत्री योगी से अखिलेश के शूद्रों पर पूछे गए सवाल दरअसल हिंदुत्व की राजनीति का दूसरा रूप है जो भाजपा को बड़ा विचलित किये हुए है. जातीय जनगणना की मांग आने वाले चुनाव में बड़ा फर्क डाल सकती है यह बात सपा को भी मालूम है और भाजपा को भी. रामचरित मानस का मुद्दा यूँ ही नहीं उछाला गया है, अखिलेश यादव इसपर बचते भी हैं मगर इसे दुसरे तरीके से उभारते भी हैं. आज सदन में जब उन्होंने घर को गंगाजल से धुलवाने का प्रकरण उठाया तो उसका सीधा सा मतलब यही था भाजपा शूद्रों के साथ कैसा व्यवहार करती है. अखिलेश का प्रयास यही है कि अगड़ों और पिछड़ों की खाई को और बड़ा करें। शूद्रों का मुद्दा उठाकर वो भाजपा से पिछड़ों, दलितों और उन आदिवासियों को दूर करें जो पांच किलो सरकारी अनाज को अबतक मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते आ रहे हैं.

यही वजह है कि अखिलेश बिहार से शुरू हुई जातिगत जनगणना को यूपी में भी बड़ा चुनावी मुद्दा बनाना चाहते हैं. समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को जहाँ सदन में ज़ोरशोर से उठा रही है वहीँ सड़क पर भी वो जातीय जनगणना को लेकर उतर चुकी है. प्रदेश के ज़िलों में जातीय जनगणना को लेकर गाँव गाँव सभाओं का दौर भी शुरू हो चुका है. पार्टी का पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ लोगों को जाकर बता रहा है कि जातीय जनगणना के बिना प्राप्त आंकड़े अधूरे होते हैं , गरीबों में सबसे हाशिये पर कौन है? बेघर कौन लोग है? अशिक्षित कौन सबसे ज्यादा रह गया इस बारे में जातीय जनगणना से ही पता चलेगा। लोगों को बताया जा रहा है कि बिना जातियां गिने वंचित शोषित वर्ग की पहचान अधूरी रह जाती है। सपा की इस कोशिश को आप ध्रूवीकरण की एक ऐसी कोशिश कह सकते हैं जैसी भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे पर अबतक करती आ रही है. जातीय आंकड़ों की अगर बात करें तो ऐसा माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में लगभग 52 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग की जातियां है और 21 प्रतिशत दलितों की. कुल मिलकर 70 प्रतिशत से भी अधिक। यही भाजपा की परेशानी है. वो 85 प्रतिशत हिन्दुओं को अपना लक्ष्य बनाना चाहती है और सपा के निशाने पर प्रदेश की 73 प्रतिशत यह आबादी प्लस मुस्लिम समुदाय निशाने पर है. यही वजह है भाजपा जातीय जनगणना से हमेशा पीछे भागती है लेकिन इस बार सपा भाजपा को किसी भी कीमत पर भागने नहीं देना चाहती।

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