तू डाल डाल मैं पात-पात!

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तू डाल डाल मैं पात-पात!

ज़ीनत सिद्दीक़ी

तू डाल डाल मैं पात-पात!

मोदी-ममता और अलपन! इसे आप किसी फिल्म के शीर्षक की तरह देख सकते हैं जिसकी शूटिंग कोलकाता और दिल्ली में चल रही है. पत्रकार से नौकरशाह बने एक आईएएस को लेकर दिल्ली और कोलकाता के बीच घमासान जारी है. बात ज़िद पर बन आयी है, प्रतिष्ठा का सवाल खड़ा हो गया है. कोई भी झुकने को तैयार नहीं है और भुगतना पड़ रहा है बेचारे अलपन को.

बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब। मशहूर शायर ग़ालिब के इस मिसरे की तरह यह मामला भी बेसबब नहीं है. इस मामले के पीछे बड़ा दर्द और पीड़ा छुपी हुई जो आये दिन इस तरह के विवादों के रूप में उभर रही है. बंगाल चुनाव की हार कभी न भूलने वाली दुर्घटना की तरह है. अपने तमाम अस्त्र-शस्त्र, धन-बल, मान-प्रतिष्ठा सबकुछ दांव लगाकर सोनार बांग्ला बनाने का सपना देखने वाली पार्टी के लिए यह हार किसी आघात से कम नहीं . एक ऐसी पार्टी, एक ऐसी सरकार जो अपनी छवि के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है, फिर चाहे वह नैतिक हो या अनैतिक, उसके लिए ममता के हाथों हार किसी अपमान से कम नहीं। इसलिए बंगाल में तीसरी बार सरकार संभालते ही ममता बनर्जी पर हमले शुरू हो चुके हैं. मंत्रियों के लगातार दौरे, राज्यपाल जी की बार-बार नसीहतें और टकराव की बातें साफ़ ज़ाहिर करती हैं कि हार के अपमान का बदला लेने का सिलसिला आगे भी इसी तरह जारी रहेगा।

आइये थोड़ा इस नए विवाद के बारे में जान लेते हैं, दरअसल इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए हमें 28 मई की उस मीटिंग का ज़िक्र करना होगा जब प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक मीटिंग होने वाली थी, मीटिंग अहम् थी, इस मीटिंग में साइक्लोन यास से हुए नुकसान का जायज़ा लेना था, ममता को भी पहुंचना था. ममता पहुंची मगर देर से. चुनाव में हार से टूटे हुए दिल को और चोट पहुंची। उसपर ढंग से बात भी नहीं की और चक्रवात से हुए नुक्सान से जुड़े दस्तावेज़ पकड़ा कर ममता चलती बनीं। ज़ाहिर है भड़कना लाज़मी था. भड़क तो गए मगर ममता को तो कुछ कर नहीं सकते थे इसलिए सारी गाज राज्य के मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय पर गिरी। अब आप इसे खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे या धोबी से जीत न पावे और गधे के कान उमेठे, कुछ भी कहा सकते हैं.

अलपन बंदोपाध्याय जो अभी तक केंद्र और बंगाल सरकार के बीच धुरी का काम कर रहे थे, केंद्र सरकार के चहेते भी थे मगर अब ममता के मोह में थे. कोरोना महामारी से लड़ाई में ममता को उनकी बहुत ज़रुरत थी, यह बात ममता ने केंद्र को पत्र लिखकर भी बताई थी और अनुरोध भी किया था कि बंदोपाध्याय को दिल्ली न बुलाया जाय, मगर जब बात मान-अपमान की हो तो यह सारी बातें, पत्राचार, विनती, अनुरोध सब बेकार की बातें हो जाती हैं.

दरअसल जिस तरह मोदी जी अपने विरोधियों पर कोई रहम नहीं करते वहीँ ममता भी अपने दुश्मन को आसानी से माफ़ नहीं करतीं। ममता आसानी से भड़क जाती हैं इसी बात को ध्यान में रहकर ही मीटिंग में इस समय ममता के सबसे बड़े दुश्मन शुवेंदु अधिकारी को शामिल किया गया. क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप ममता बनर्जी का यह “इंतज़ार कांड” सामने आया और केंद्र सरकार ने इसे मुद्दा बना लिया।

बहरहाल बात तू डाल डाल मैं पात-पात वाली कहावत पर आ गयी. केंद्र ने बंदोपाध्याय को दिल्ली वापस बुलाया तो ममता ने मना कर दिया। मोदी जी ज़्यादा ज़िद पर अड़े तो इस्तीफ़ा ही दिलवा दिया और अपनी पर्सनल टीम का मुखिया बना दिया। शह और मात का खेल अभी जारी है. सामने वाला खिलाड़ी भी शातिर है, अगला क्या चाल चलने वाला है उसे अच्छी तरह मालूम है. हम तो यही कहेंगे कि सेर को शायद सवा सेर मिला गया!

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