-फरीद वारसी
देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर से ग्रस्त है। ऐसे में चार राज्यों बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और एक केंद्र शासित राज्य पुडुच्चेरी विधानसभा चुनावों के परिणाम आए। वैसे तो देश के चार राज्यों बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और एक केंद्र शासित राज्य पुडुच्चेरी के विधानसभा चुनावों पिछले दिनों हुए थे। किन्तु सारे देश की नजरें बंगाल विधानसभा चुनाव में लगी हुई थीं। इसका प्रमुख कारण यह कि केंद्र की सत्तारूढ भाजपा ने ममता को हरा कर बंगाल जीतने के लिए साम, दाम दंड और भेद के सारे हथकंडे अपनाते हुए वे सारी सीमाएं लांघने के हर संभव प्रयास किए थे, जिन्हें चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा कतई नहीं कहा जा सकता है। लेकिन इन सबके विपरीत संघर्ष का प्रतीक और अपने जुझारू तेवरांे के लिए प्रसिद्ध ममता ने आगे बढ़ कर न सिर्फ भाजपा की चुनौतियों का सामना किया, बल्कि जोरदार तरीके से पलटवार करते हुए जीत की हैट्रिक मार कर भाजपा, संघ, निर्वाचन आयोग, सीबीआई, ईडी और गोदी मीडिया को ऐसा चित किया कि भाजपा हाथ मलती ही रह गई। अब यह बात अलग है कि तृणमूल कांगे्रस की इस जीत का मजा उस वक्त किरकिरा हो गया, जब ममता नंदीग्राम से स्वयं अपना चुनाव अपने ही पुराने सिपाहसलार शुभेद्रु अधिकारी से 1956 मतों से हार गईं। लेकिन इसके बाद भी ममता के बंगाल फतह के ऐतिहासिक महत्व को नाकारा नहीं जा सकता है। क्योंकि जीत तो आखिर जीत ही होती है, वह भी लगातार तीसरी जीत और दो सौ से ज्यादा सीटें जीतना यह साबित करता है कि बंगाल मंे ममता को कोई विकल्प नहीं है एवं मां, माटी और मानुष की राजनीति करने वाली ममता की बंगाल में लोकप्रियता कायम है। जिसे मोदी-शाह की जोड़ी ने काफी हलके में लेने की कोशिश करने की भूल की और जिसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा।
वहीं इससे पूर्व भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में बंगाल से 18 सीटें जीतने के बाद से ही अमितशाह के दिशा-निर्देश में इस राज्य का विधानसभा चुनाव जीतने का रोडमैप तैयार करते हुए अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी थी। गोदी मीडिया का ऐसा मानना है कि भाजपा चुनाव लड़ने व जीतने की मशीन बन गई है और कोई उसके सामने नहीं टिक सकता है। जबकि भाजपा की राजनीति का एकमात्र फलसफा उसकी उन्मादी सांप्रदायिक राजनीति, झूठ, फरेब व दुष्प्रचार कर मतों का ध्रुवीकरण करते हुए दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को सीबीआई का डर या दूसरे प्रलोभन दिखा कर अपने पाले में करने की रहती है और अपनी इसी राजनीतिक फितरत का प्रदर्शन भाजपा ने बंगाल में किया व आक्रमक अंदाज में चुनाव प्रचार करते हुए मोदी-शाह, नड्डा, दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों व भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मैदान में उतार कर यह साबित करने की कोशिश की कि ममता कमजोर हो रही हैं और भाजपा सत्ता में आ रही है। यही कारण रहे अमितशाह हर मौके पर यही कहते दिखे भाजपा इस बार दो सौ सीटें हासिल करेगी। अब यह बात अलग है कि जब मतगणना हुई तो भाजपा सौ के आंकडे को भी नहीं पार कर पाई। वहीं हमेशा चुनावी मूड में रहने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह से अपनी रैलियों में ‘‘दीदी ओ दीदी’’ का नारा गढ़कर उन पर तंज करते हुए मतदान से पहले ही यह घोषणा कर दी कि दीदी तो चुनाव हार गईं। बस ममता ने मोदी के इसी तंज को बंगाल की अस्मिता से जोड़ते हुए नारा दिया कि खेला होएब,े तो भाजपा अपने ही दंाव में उलझ कर रह गई। भाजपा के पक्ष में हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण तो हुआ नहीं, उलटे भाजपा को रोकने के लिए मुस्लिम और भाजपा को न पसंद करने वाला धर्मनिरपेक्ष मतदाता तृणमूल कांगे्रस के पक्ष में ऐसा एकजुट हुआ कि अमितशाह की सारी चुनावी रणनीति ही धरी की धरी रह गई। अमितशाह को अपनी आक्रमक चुनावी रणनीति पर बहुत भरोसा था, पर उसे देख कर ही बंगाल में बहुत ही खामोशी से एक ऐसी लहर ने जन्म लिया जिसकी भनक तक भाजपा के रणनीतिकारों को नहीं लग पाई। बंगाल में कांगे्रस और वामदलों का सूपड़ा साफ होना ही इसी उपरोक्त लहर का ही परिणाम है। जिसके बारे में शाह अंदाजा कर रहे थे कि अगर कांगे्रस और वामदलों के गठबंधन को पिछले का आधा ही वोट मिल गया तो भाजपा का काम बन जाएगा। लेकिन हुआ वह जिसकी उम्मीद भाजपा और उसके नेताओं को दूर-दूर तक नहीं थी। हां, बंगाल के चुनाव परिणामों ने यह बात तो साबित कर दी कि अगर विपक्ष का चेहरा मजबूत हो तो मोदी-शाह की भाजपा को भी चुनौती दी जा सकती है।

