History of ram mandir buzinessbytes series 7: बाबरी विध्वंस के बाद देश में सांप्रदायिक दंगे बढ़ गए थे। पूरा देश कर्फ्यू की चपेट में आ गया था। महाराष्ट्र, पटना समेत कई राज्यों में हिंदू मुस्लिम संघर्ष चरम पर पहुंच गया। वहीं अयोध्या आगजनी की शिकार थी।।देश में अलग ही माहौल चल रहा था। 6 दिसंबर 1992 के बाद विवादित स्थल पूरी तरह से बदल गया था। अब वहां मस्जिद का ढांचा नहीं बचा था। 1950 में पहली बार बाबरी मस्जिद को विवादित ढांचा कहकर संबोधित किया गया था। विध्वंस के बाद स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। राम मंदिर का मुद्दा अब चुनावी मुद्दा बन चुका था। भाजपा की घोषणा पत्र में यह चुनावी एजेंडे के रूप में सबसेपहले सामने आया था। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक राम मंदिर मुद्दे पर उसे वक्त अटल बिहारी वाजपेई ने बहुत बड़ा बयान भी दिया था उन्होंने कहा था कि राम मंदिर का मुद्दा हमारी पार्टी से जुड़ा मुद्दा है। जिसे कभी नहीं छोड़ सकते। गठबंधन धर्म का पालन जरूर कर रहे हैं लेकिन जिस दिन भी काबिल होंगे उसे दिन राम मंदिर जरूर बनेगा। श्री राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद विवाद जमीनी विवाद बन चुका था और मामला भी कोर्ट में चला गया था। फैजाबाद कोर्ट से यह मामला अब हाई कोर्ट तक पहुंच चुका था।
सर्वे में जुटी एएसआई
वर्ष1949 में यह खबर फैली की रामलला गर्भगृह में प्रकट हुए हैं। इसके बाद ही यह मामला पहली बार कोर्ट में पहुंचा था। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 1975 – 76 में एएसआई ने भूमि का सर्वे शुरू किया. इससे पहले तीन बार सर्वे किया जा चुके थे जिसमें 1862- 63 में सबसे पहली बार परिसर का सर्वे किया गया था. इसके बाद 1889 से 1819 में सर्वे हुआ था। 1969- 70 में भी परिसर में सर्वे किया गया था।
इसके बाद हुए सर्वे ने राम मंदिर निर्माण में अहम भूमिका निभाई प्रोफेसर बीबी लाल की अगुवाई में सर्वे किया गया। उन्होंने एक पत्रिका को अपना इंटरव्यू दिया था और उकई खुलासे किए। उन्होंने कहा की साइट के नीचे उन्हें मंदिर जैसे खंबे मिले थे वह बहुत ही पुराने थे। जिसके बाद विश्व हिंदू परिषद और हिंदूवादी संगठनों ने इस मामले को जमकर उठाया। हाई कोर्ट में भी यह मुद्दा काफी अहम रहा। 2003 में एक बार फिर से बाबरी परिसर की खुदाई शुरू हुई। इस बर डॉ. बीआर मनी के नेतृत्व में टीम ने परिसर का मुआयना किया। करीब 2 महीने तक विवादित स्थल की खुदाई हुई। इस काम के लिए 131 मजदूरों की टीमों ने रात दिन काम किया। 11 जून 2003 को एएसआई ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके बाद अगस्त 2003 में 74 पेज की फाइनल रिपोर्ट सबमिट की गई। जिसमें खुदाई के बारे में काफी सारे तथ्य और चीज मिलाने का जिक्र किया गया था। उधर बीबी लाल ने जिन खंभों का जिक्र भी किया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि खंभे कच्ची ईंटों से बने हुए थे। एक खंभे से दूसरे के बीच में दूरी का भी जिक्र किया गया था। जिसके आधार पर ही विश्व हिंदू परिषद ने विवादित परिसर को मंदिर की भूमि कहकर संबोधित करना शुरू कर दिया। इस खुदाई में एक चबूतरा भी मिला था जिसे हिंदू पक्ष ने राम चबूतरा कहा था इन्हीं रिपोर्ट के आधार पर 2003 में हाईकोर्ट में इस विवाद पर मुकदमा चलता रहा।
2010 में आया पहला फैसला
हाई कोर्ट में चल रहे मामले पर पहली बार 2010 में फैसला आया था। तकरीबन 480 वर्षों से चल रहे विवाद पर ऐतिहासिक फैसले को लेकर देश भर में हाई अलर्ट जारी किया गया था। उत्तर प्रदेश में उस वक्त मायावती सरकार थी। उन्होंने इस फैसले को लेकर पहले ही पुख्ता इंतजाम किए हुए थे। 30 सितंबर, 2010 का वह दिन बहुत ही महत्वपूर्ण माना जा रहा था। पूरे देश की नजर इस मुद्दे पर टिक गई थी। माना जा रहा था कि इस एक फैसले से पांच शताब्दियों से चले आ रहे विवाद को दिशा मिलने वाली थी। हाई कोर्ट में जस्टिस ए यू खान, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस डीवी शर्मा की बेंच ने पहली बार फैसला सुनाया। इस मामले में कई पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की बेंच ने विवादित जमीन को तीन भागों में बांटने का निर्णय लिया। जिसमें एक भाग रामलला, दूसरा भाग निर्मोही अखाड़े और तीसरा भाग सुन्नी वक्त बोर्ड को दिए जाने के लिए आदेशित किया गया।। उस वक्त तीन भागों में बताने के साथ देश को लेकर हिंदू पक्ष भी फैसला मानने को तैयार था, लेकिन सुन्नी वक्त बोर्ड फैसले को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। उसने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर रोक लगा दी।

