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Modi surname case: गुजरात हाईकोर्ट की जज ने राहुल की याचिका पर सुनवाई से किया मना

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अहमदाबाद। गुजरात हाई कोर्ट की जज ने मोदी सरनेम मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा सूरत सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई से मना करते हुए खुद को अलग कर लिया। जानकारी के अनुसार, राहुल गांधी की वकील पीएस चंपानेरी ने न्यायमूर्ति गीता गोपी की अदालत में मामले का जिक्र करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की थी। याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई के बाद उन्होंने कहा, ‘मेरे सामने नहीं’। जज द्वारा सुनवाई से खुद को अलग किए जाने के बाद इसे लेकर सियासत शुरू हो गई है।

सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ राहुल गांधी ने गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। जज द्वारा खुद को सुनवाई से अलग किए जाने के बाद राहुल गांधी की वकील ने जानकारी दी। राहुल गांधी की वकील चंपानेरी ने कहा कि अदालत ने पहले उन्हें मामले को बुधवार को सुनने के लिए अनुमति दी थी। लेकिन जब केस सुनवाई के लिए आया तो उन्होंने मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के पास भेजेंगे नोट

अपने अगले कदम के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि अब मामले को किसी अन्य अदालत में रखने के लिए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के पास एक नोट भेजा जाएगा। चंपानेरी ने कहा कि इससे पहले, मामले को न्यायमूर्ति गीता गोपी की अदालत में ले जाने का अनुरोध किया गया था क्योंकि उनकी अदालत आपराधिक पुनरीक्षण के विषय से संबंधित है।

इस मामले में हुई थी राहुल को सजा

राहुल गांधी की ओर से 2019 में मोदी उपनाम को लेकर की गई टिप्पणी के मामले में 23 मार्च को सूरत की अदालत ने फैसला सुनाया था। कोर्ट ने उन्हें धारा 504 के तहत दो साल की सजा सुनाई थी। हालांकि, कोर्ट ने फैसले पर अमल के लिए कुछ दिन की मोहलत भी दी थी। इसके साथ ही उन्हें तुरंत जमानत भी दे दी थी। राहुल ने सूरत की कोर्ट में याचिकाएं भी दाखिल की थ्राीं, जिनमें एक को कोर्ट ने खारिज कर दिया था और दूसरी पर तीन मई को सुनवाई होनी है।

यह कहता है नियम

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने लोक-प्रतिनिधि अधिनियम 1951 को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने इस अधिनियम की धारा 8(4) को असंवैधानिक करार दे दिया था। इस प्रावधान के मुताबिक, आपराधिक मामले में (दो साल या उससे ज्यादा सजा के प्रावधान वाली धाराओं के तहत) दोषी करार किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को उस सूरत में अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता था, अगर उसकी ओर से ऊपरी न्यायालय में अपील दायर कर दी गई हो। यानी धारा 8(4) दोषी सांसद, विधायक को अदालत के निर्णय के खिलाफ अपील लंबित होने के दौरान पद पर बने रहने की छूट प्रदान करती थी।

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