सुनील शर्मा
- गैरसैंण कमिश्नरी गठन पर तीरथ सरकार ने लगायी हुई है रोक
- विपक्ष, जनता से लेकर भाजपा मंत्री-विधायक भी थे इस निर्णय के खिलाफ
न्यूज डेस्क। तीरथ सिंह रावत ने उत्तराखंड का मुख्यमंत्री पद संभालते ही गैरसैंण कमिश्नरी गठन पर जनभावनाओं को सम्मान करने की बात कही थी। कोरोना संक्रमित होने की वजह से शुक्रवार को पत्रकारों से वर्चुअल रूबरू हुए सीएम रावत ने गैरसैंण कमिश्नरी गठन पर रोक जारी रखने की बात कही है। सीएम तीरथ सिंह रावत ने साफ तौर पर कहा कि, जनभावनाएं जो कहेंगी, यहां वही होगा। इसी वजह से राज्य सरकार ने कमिश्नरी के गठन को पास नहीं किया है और नोटिफिकेशन पर भी रोक लगाई गई है। सरकार का रूख देखकर स्पष्ट है कि वो अगर पूर्व सीएम के इस फैसले वापस नहीं लेगी तो इसे सदन से पास भी नहीं होने देगी। यानि भाजपा सरकार के इस कार्यकाल में तो गैरसैंण कमिश्नरी गठन होना संभव नहीं दिख रहा। आखिर क्यों गैरसैंण कमिश्नरी को लेकर इतना हंगामा हुआ और क्यों भाजपा सरकार अपने ही सीएम के फैसले पर रोक लगाये हुए है, यह समझाने के लिये पेश है ‘बिजनेस बाइट्स’ की स्पेशल रिपोर्ट …
सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने खुद ही लिया था फैसला
उत्तराखंड के बजट सत्र के दौरान सीएम त्रिवेंद सिंह रावत ने जब गैरसैंण को कमिश्नरी घोषित किया तो राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गयी। उत्तराखंड में गढ़वाल, कुमाऊं के बाद बनाये गये इस तीसरे मंडल में चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिले शामिल किए गए थे। गैरसैंण को कमिश्नरी का मुख्यालय बनाने का ऐलान किया गया था।
पूर्व सीएम का यह फैसला जहां जनता से लेकर विपक्षी दलों को स्वीकार नहीं हुआ वहीं खुद भाजपा संगठन में भी इस निर्णय को लेकर सीएम त्रिवेंद सिंह रावत का विरोध शुरू हो गया था। तीरथ सरकार में कैबिनेट मंत्री और शासकीय प्रवक्ता सुबोध उनियाल का कहना है कि गैरसैंण कमिश्नरी गठन का निर्णय त्रिवेंद्र सिंह रावत का अपना फैसला था। इस बारे में पूर्व सीएम ने मंत्रीमंडल से चर्चा करने या इस विषय पर उनकी राय जानने का प्रयास भी नहीं किया था। पार्टी नेताओं का मानना था कि बिना विचार किये जल्दबाजी में लिया गया यह निर्णय आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है।
अल्मोड़ा बना सीएम की चाहत में रोड़ा
चार मार्च को तत्कालीन सीएम त्रिवेंद्र रावत ने गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने का ऐलान कर चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर को शामिल किया था। मगर इस कमिश्नरी में अल्मोड़ा को शामिल करना उनकी चाहत को पूरा करने में रोड़ा बन गया। अल्मोड़ा को गैरसैंण कमिश्नरी में शामिल करने को लेकर आम आदमी पार्टी ने लगातार विरोध-प्रदर्शन करना जारी रखा तो वृद्ध जागेश्वर जन संघर्ष समिति भी इस फैसले के विरोध में उतर आयी। प्रदर्शनकारियों ने तीसरी कमिश्नरी के गठन को औचित्यहीन करार देते हुए अल्मोड़ा को कुमाऊं से अलग कर गैरसैंण में शामिल करना अल्मोड़ा की जनता के साथ विश्वासघात बताया। वहीं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं जागेश्वर विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल का कहना था कि ऐतिहासिक अल्मोड़ा कुमाऊं का हृदयस्थल है। प्राचीनकाल से ही कला एवं संस्कृति के साथ प्रशासनिक गढ़ रहे अल्मोड़ा का महत्व समझने में सीएम नाकामयाब रहे। उन्होंने सांस्कृतिक नगरी का वजूद बचाने के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने का ऐलान किया था। इस मुद्दे पर अल्मोड़ा की जनता भी तत्कालीन सीएम के फैसले के खिलाफ हो गयी थी। इस मुद्दे ने जनआंदोलन का रूप ले लिया था और आने वाले चुनाव में भाजपा को जनता की नाराजगी का खमियाजा उठाना ही पड़ता जिसको लेकर भाजपा संगठन में खलबली मची हुई थी।
गैरसैंण को जिला बनाने की बजाये कमिश्नरी का दे दिया दर्जा
गैरसैंण को जिला बनाने की बजाये कमिश्नरी बनाने के सरकार के फैसले पर विपक्षी दलों ने सरकार को घेर लिया था। वहीं इस मामले मंे जनता का विरोध सरकार के गले की फांस बन गया था। नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री डाॅ. इंदिरा हृदयेश ने गैरसैंण को लेकर भाजपा पर जुमलेबाजी करने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि गैरसैंण को सही मायने में लाभ जिला बनाने से होता। वहीं पूर्व सीएम हरीश रावत ने भी गैरसैंण को जिला बनाने की पैरवी की। उन्होंने कहा कि, सीएम की घोषणा की वजह से प्रशासनिक भ्रम भी पैदा हो गया है। गैरसैंण कमिश्नरी गठन के विरोध में उतरे उक्रांद ने सरकार का प्रपंच करार देते हुए गैरसैंण को कमिश्नरी की बजाये जिला बनाने की मांग की थी।
जनभावनाओं के अनुरूप नहीं लिया फैसला
पूर्व सीएम त्रिवेंद सिंह रावत का गैरसैंण कमिश्नरी गठन का निर्णय कितना सही या कितना गलत था यह चर्चा का विषय है। मगर यह तय है कि यह निर्णय लेने से पहले उन्होंने जनभावनाओं का ख्याल नहीं रखा। अपने निर्णय को जल्द लागू करने की जल्दबाजी में उन्होंने पार्टी मंत्री-विधायकोे को भी विश्वास में नहीं लिया। अल्मोड़ा को कुमाऊं से अलग कर गैरसैंण कमिश्नरी में शामिल करने से जनता में नाराजगी व्याप्त हो गयी। वहीं गैरसैंण को मंडल बनाकर विभाजन करने का आरोप लगातेेे हुए विपक्षी दलों ने इसे मुद्दा बनाना शुरू कर दिया। गैरसैंण कमिश्नरी गठन को लेकर सरकार की भारी फजीहत हुई और माना जाता है कि सीएम त्रिवंेंद सिंह रावत से इस्तीफा दिलाये जाने के पीछे गैरसैंण मुद्दा अहम था। इस मुद्दे को लेकर आम जनता और विपक्षी पार्टियों के विरोध के साथ भाजपा मंत्री-विधायकों की नाराजगी सीएम की कुर्सी छिन ले गयी। यही कारण है कि तीरथ सिंह सरकार इस मुद्दे पर हर कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहती है। यदि सरकार गैरसैंण कमिश्नरी गठन के फैसले को वापस लेगी तो इससे पूर्व सीएम और भाजपा नेतृत्व की फजीहत होगी और विपक्षी दलों को एक और मुद्दा मिल जायेगा। लेकिन इस फैसले को लागू कर वह जनता की नाराजगी भी मोल नहीं लेना चाहती। ऐसे में कोई बीच का रास्ता तलाश रही सरकार इस फैसले को लागू न करने का आश्वासन दे रही है।

