नई दिल्ली: तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य का भुगतान अनिवार्य बनाने की अपनी मांग के लिए आंदोलनरत किसानों ने अपने समर्थन का दायरा बढ़ने के लिए पंचायतों के साथ अधिक से अधिक बातचीत के माध्यम से अपना विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है। 26 जनवरी के बाद अब तक करीब एक दर्जन महापंचायतें हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आयोजित की गई हैं, जहां भारी संख्या में आये किसानों को अवगत कराया गया है कि सरकार ज्यादातर गेहूं और धान की सरकारी खरीद के लिए एमएसपी का भुगतान करती रही है, और इससे केवल कुछ राज्यों के बामुश्किल 10-15 फीसदी किसानों को ही फायदा हुआ है।
बढ़ेगा महापंचायतों का दायरा
अखिल भारतीय किसान सभा के नेता और पूर्व सांसद हन्नान मोल्लाह ने कहा कि आने वाले दिनों में पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यों में दर्जनों महापंचायत आयोजित करने की योजना है क्योंकि बड़ी रैलियों के कारण समर्थन हासिल करने में मदद मिलती है। अखिल भारतीय किसान सभा के नेता पी कृष्ण प्रसाद कहते हैं, “हमने अपने राज्य प्रतिनिधियों से कहा है कि महापंचायतों का आयोजन करें ताकि ग्रामीण भागीदारी और सरकार द्वारा फैलाई जा रही गलतफहमी की समझ बढ़े।”
मारे गए किसानों और सैनिकों के सम्मान में ’मशाल’ मार्च
आंदोलन के तहत अगले हफ्ते से 14 फरवरी को एक घंटे या उससे अधिक समय तक गांवों में सरकारी कार्रवाई में मारे गए किसानों और सैनिकों के सम्मान में ’मशाल’ मार्च निकालेंगे। मोल्लाह कहते हैं कि 16 फरवरी को देश भर में छोटी-छोटी जनसभाएँ प्रस्तावित हैं, ताकि लोगों को “संसद में प्रधानमंत्री के भाषणों के माध्यम से झूठ बोलने” के बारे में जागरूक किया जा सके। 18 फरवरी को देशभर में 4 घंटे के लिए ट्रेन रोको अभियान चलाएंगे। महात्मा गांधी द्वारा किए गए अहिंसक विरोध का उदाहरण देते हुए हिंसा नहीं करने की सलाह दी गई है।

