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गुजरात-हिमाचल के एग्जिट पोल्स, लोकप्रियता जीत की ज़मानत नहीं

आर्टिकल/इंटरव्यूगुजरात-हिमाचल के एग्जिट पोल्स, लोकप्रियता जीत की ज़मानत नहीं

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अमित बिश्नोई
दो राज्यों के चुनाव, दोनों भाजपा शासित, दोनों ही राज्यों में सफलता के ज़िम्मेदार प्रधानमंत्री मोदी। दोनों ही राज्यों के एग्जिट पोल्स सामने आ गए हैं और दोनों ही एग्जिट पोल्स में बहुत बड़ा अंतर है. एक जगह यानि गुजरात में भाजपा को 27 वर्षों के शासन के बाद भी एकबार और मौका मिल रहा है और मौका ही नहीं प्रचंड तौर पर मौका मिल रहा वहीँ दूसरे राज्य हिमाचल में कांग्रेस से कांटे की टक्कर है बल्कि एक नेशनल टीवी चैनल का एग्जिट पोल कांग्रेस की सरकार बनते हुए दिखा रहा है.उस चैनल के अलावा भी और जितने भी चैनलों ने सर्वे किया है वो भी हिमाचल प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच ज़्यादा फासला नहीं दिखा रहे हैं.

अब इन दो राज्यों के ओपिनियन पोल्स से कई सवालों का जन्म हो रहा और वो है प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता से सम्बंधित है. अक्सर कहा जाता है कि 2014 के बाद से भाजपा जितने भी चुनाव जीतती है वो प्रधानमंत्री मोदी की छवि के दम पर जीतती है, फिर वो चाहे लोकसभा का हो राज्यसभा का हो, मुनिसिपलिटी का हो या फिर पंचायत का हो. प्रधानमंत्री मोदी की इमेज ही हर जगह इस्तेमाल की जाती है और यह बात जग ज़ाहिर भी है. भाजपा तो मोदी जी के गुणगान करती ही है, विपक्षी भी इस बात से परेशान है कि भाजपा मोदी जी का हर जगह इस्तेमाल क्यों करती है. अभी गुजरात चुनाव में इसी मुद्दे पर कांग्रेस के नए अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का रावण के बीस सिर वाला एक विवादित बयान भी आया जिसे पीएम मोदी और भाजपा ने गुजरात चुनाव में खूब भुनाया। खरगे को इस बात पर ऐतराज़ था कि भाजपा मोदी जी का हर छोटे बड़े चुनाव में इस्तेमाल क्यों करती है. और अब तो मोदी जी खुद ही अपनी ब्रांडिंग करने लगे हैं और अपने नाम पर भाजपा के लिए वोट मांगने लगे हैं.

सवाल अब इस बात का है कि जब प्रधानमंत्री मोदी इतने ही लोकप्रिय हैं कि जीत की ज़मानत कहे जाते हैं तो फिर दो ऐसे राज्यों जहाँ पर उन्हीं की पार्टी की सरकार है दो अलग तरह के एग्जिट पोल्स क्यों? क्या हम इसे दोनों राज्यों के वोटरों की सोच का अंतर समझें या फिर यह समझा जाय कि जिस तरह के मुद्दों और जिस तरह की बातों से गुजरात के वोटर प्रभावित हो जाते हैं वो मुद्दे, वो बातें हिमाचल प्रदेश में काम नहीं कर रही हैं. क्या हम इसे इस तरह से समझें कि हिमाचल के लोग मुद्दों पर मतदान करते हैं और गुजरात के लोग अपनी अस्मिता को ललकारने पर, या फिर यह कहा जाय कि गुजरात के लोग मोदी जी के अलावा अन्य किसी भी पार्टी के नेता को गुजराती नहीं बाहरी समझते हैं, ऐसा मैं इस लिए कह रहा हूँ कि चुनावी भाषणों में मोदी जी गुजरात की जनता से कांग्रेस या दूसरी पार्टियों को गुजरात विरोधी करार देते हैं और जनता से इन पार्टियों से खबरदार रहने के लिए कहते हैं.

बहरहाल इन ओपिनियन पोल्स से यह बात तो साबित ही होती है कि मुद्दे ज़रूर काम करते हैं बस देखने वाली बात यह है कि उस राज्य की जनता की सोच किस तरह की है. मोदी जी का हिमाचल के चुनाव में सबसे ज़्यादा ज़ोर इस बात पर था कि हर बार सरकार बदलने की परंपरा को बदलिए, बात तो यही है कि आपने काम किया है तो इस तरह की अपील की ज़रुरत ही नहीं, आप इतने लोकप्रिय हैं, आप और आपकी पार्टी जो भी काम करती है वो ऐतिहासिक होता है तो फिर सिर्फ काम की बात होनी चाहिए। अगर हम दोनों राज्यों के चुनावों में प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों को देखें तो गुजरात की रावण, औकात, हिटलर जैसी बातें उन्होंने हिमाचल के चुनावों में नहीं की, क्योंकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि यहाँ पर इस तरह की बातों को कोई भाव नहीं मिलेगा। तो वहां पर उनका पूरा चुनाव डबल इंजन की सरकार के फायदे बताने पर ही निर्भर रहा. इस लेख में मेरे कहने का सिर्फ इतना मतलब है कि लोकप्रियता की बातें बेकार की बातें हैं, लोकप्रियता ही अगर जीत की ज़मानत होती तो फिर एग्जिट पोल्स दोनों राज्यों के चुनावों में इतना अंतर नहीं दिखाते खासकर तब जबकि दोनों राज्यों में भाजपा की ही सरकार है. एक बात और कि यह लेख आज के एग्जिट पोल्स के अनुमानों पर लिखा गया है, अगर अनुमान ग़लत होंगे तो लेख भी गलत हो सकता है.

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