जेल यात्रा के बाद मेरा जुड़ाव रंगमंच से हो गया था- पंकज त्रिपाठी

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न्यूज डेस्क: उन्होंने साल 2004 में फिल्म ‘रन’ से अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वह करीब 8 साल तक छोटे-मोटे रोल करते रहे। आखिरकार साल 2012 में आई फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में उन्हें पहचान मिली और फिर उनकी किस्मत उनके आगे चल पड़ी। ‘सिंघम रिटर्न्स’, ‘मसान’ ‘सुपर 30’ , ‘गुंजन सक्सेना’, ‘अंग्रेजी मीडियम’, ‘मिमी’, ‘ओह माय गॉड 2’ जैसी कई बड़ी फिल्मों में अहम रोल के साथ वेब सीरीज़ ‘सेक्रेड गेम्स 2’, ‘मिर्जापुर’, ‘क्रिमिनल जस्टिस’ में उनकी ऐक्टिंग की धूम मच गई। हम बात कर रहे हैं पंकज त्रिपाठी की। जिनके बारे में अब दर्शक यही सोचते हैं कि अगर किसी फिल्म में पंकज त्रिपाठी हैं जो कुछ जरूर अच्छा होगा। हालांकि यह सफर उनके लिए आसान नहीं था। अपने गांव से दिल्ली और दिल्ली से मुम्बई तक पहुंचने में उन्हें कई मुशकिलों का सामना भी करना पड़ा है।

पत्नी ने दिया था मेरा साथ

8 हजार रुपए के लिए फिल्म रन में दो सीन करने वाले पंकज को हर ऑडिशन में ‘नॉट फिट’ ही सुनने को मिलता था। और आज मिर्जापुर के कालीन भैया हों या फुकरे के पंडित जी, पंकज के लिए किरदार लिखे जा रहे हैं। पटना के छोटे से गांव से निकलकर बॉलिवुड के आसमान पर चमकने वाले, नैशनल अवॉर्ड से नवाजे जा चुके पंकज ने मुंबई में स्ट्रगल के दौरान मैंने घर से पैसे नहीं लिए बल्कि होटेल में काम किया। पंकज कहते हैं कि मेरे स्ट्रगल के दौर में जिसने मेरा सपॉर्ट किया वह मेरी पत्नी थी। वह टीचर थीं और उसी की सैलरी हमारे लिए मुंबई में सहारा बनी थी। उस वक्त ढाई हजार रुपये देकर हम रेंट पर रहते थे। पहले मैं एक फोन कॉल के लिए इंतजार करता था कि काश कोई फोन आ जाए और कोई रोल मिल जाए। आज हर दूसरी कॉल में ऑफर मिलता है। आज मेरे पास काम की कमी नहीं है, लोग मुझे सफल कह रहे हैं तो इस बात का कोई घमंड भी नहीं है। मुझे मालूम है कि कुछ भी स्थायी नहीं है फिर वह चाहे असफलता हो या सफलता, यह एक चक्र है। हालांकि, अगर यह सफलता मुझे जल्दी मिल जाती तो शायद संभालना मुश्किल हो जाता। बगैर मेहनत के जब कोई चीज हासिल हो जाती है तब हम उसकी कीमत नहीं समझते हैं। मैं एक किसान का बेटा हूं। मैं अन्न की कीमत जानता हूं, उसी तरह मैं अपनी सफलता की कीमत भी जानता हूं क्योंकि यह मुझे लंबी मेहनत के बाद मिली है।

पिता जी चाहते थे डॉक्टर बनूं

मैंने कभी ऐक्टर बनने के बारें में सोचा नहीं था। हां पिता जी मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे। मैनें कोशिश भी की लेकिन नंबरों ने साथ नहीं दिया। चालीस से ऊपर कभी नहीं आए। फिर कॉलेज के दिनों में मैं छात्र राजनीति में सक्रिय था। एक वक्त वह भी आया जब हमने सरकार का विरोध किया और सात दिनों के लिए मुझे जेल जाना पड़ा था। वहां मैं पॉलिटिकल प्रिजनर था। दिन भर करने के लिए कुछ नहीं था तो लाइब्रेरी में जाकर खूब पढ़ता था। वहीं से मेरा हिंदी से लगाव शुरू हुआ था। सात दिन बाद जब जेल से बाहर आया तो फ्रीडम फाइटर जैसा अहसास हो रहा था क्योंकि मेरे हाथ पर जेल की मुहर लगा कर मुझे छोड़ा गया था। उस मुहर को दिखाकर आप बस या ट्रेन में फ्री में सफर कर सकते हैं। उस जेल यात्रा के बाद मेरा जुड़ाव रंगमंच से हो गया। और फिर थिएटर ने मुझे दिल्ली और मुम्बई की राह दिखा दी। कह सकता हूं कि मेरे फिल्मी करियर में 7 दिन की जेल का भी योगदान है।

मुझे मेरी भाषा से जज करते थे

हाल ही में एक इंटरव्यू में, पंकज त्रिपाठी ने कहा कि 2001 में जब वे पहली बार दिल्ली आए थे तो उन्हें कितना बड़ा कल्चरल झटका लगा था। उन्होंने एक यूट्यूब चैनल पर बताया कि ‘जब मैं 2001 में दिल्ली आया तो मुझे कल्चरल झटका लगा। पहली बार मैंने लड़कियों को सिगरेट पीते देखा। मैं सोच रहा था- ये कैसी लड़कियां हैं? लेकिन फिर पंद्रह दिनों के बाद, मुझे एहसास हुआ कि यह देखने का सही तरीका नहीं था।’ उन्होंने बताया कि हिंदी मीडियम से हुई उनकी पढ़ाई शहर में उनकी सबसे बड़ी बाधा बन गई। उन्होंने बताया, ‘लोग मेरी भाषा के कारण मुझे बहुत जल्दी जज करने लगे। वे मान लेते थे कि अगर कोई धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल सकता, तो वह गरीब बैकग्राउंड से होगा या उसे अनुभव की कमी होगी। लोग अक्सर आपकी क्षमता का आंकलन आपकी बोली जाने वाली भाषा के आधार पर करते हैं, जबकि सच कहा जाए तो इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है।’

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