हरिद्वार । अगर आपको अपने पूर्वजों के बारे में जानना चाहते है तो आपकी यह इक्क्षा हरिद्वार में पूरी हो सकती है. आपके नाम, पैतृक स्थान और गौत्र के साथ आप अपने कई पीढ़ियों के पूर्वजो की जानकारी पा सकते है. हरिद्वार में गंगा किनारे आपको अपनी कई पीढ़ियों का हिसाब मिल सकता है. हरिद्वार में आये आपके सभी पूर्वजो का हिसाब किताब का यहाँ बहीखाता मौजूद है. इस बहीखाते को हरिद्वार का तीर्थ पुरोहित समाज कई पीढ़ियों से मैंटेन कर रहा है. बही का यह प्रबंधन अपने आप में एक अलग ही उदाहरण है. जो एक नहीं बल्कि कई पीढ़ियों से चला आ रहा है.
बहीखातों का ख़ास प्रबंधन
बहीखातों के प्रबंधन को जानने से पहले इसकी परंपरा को एक बार हमें देखना होगा, माना यह जाता है की भगवान् राम के समय से ही इस परम्परा की शुरुवात हुई थी. तभी से गंगा तट पर तीर्थ पुरोहित अपनों की अस्थियों को लेकर आने वालों का हिसाब किताब रखते है. हरिद्वार गंगा सभा के सदस्य और राजेंद्र सिखोला के बेटे शशांक सिखोला बताते है कि तीर्थ पुरोहित समाज की खुद से ईजाद की गई इस व्यवस्था को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जा रहा है. शशांक बताते है कि प्राचीन काल में हरिद्वार आने वालों यात्रियों का हिसाब भोजपत्र पर रखा जाता था. लेकिन समय के साथ अब एक ख़ास किस्म के कागज में इस ब्यौरे को व्यवस्थित किया जाता है. सिखोला कहते हैं कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चलते हुए आज हमें मिली है जिसे वे आगे बढ़ा रहे है.
दीमक प्रुफ होते है बहीखाते
सदियों से चले आ रहे इन बहीखातों में दीमक या कीड़े से बचाने के लिए ख़ास तरह की तकनीक अपनाई जाती है. शशांक बताते है कि हर साल दीपावली के दौरान “सीरत” नाम पेड़ के पत्ते इन बही के बीच रखे जाते है जो दीमक और कीड़ों से इनकी रक्षा करते है.
एरिया वाइज होता है बँटवारा
कई पीढ़ियों के हिसाब किताब को व्यवस्थित करना अपने आप में एक अलग ही तरह का प्रबंधन है. दरअसल पुराने ज़माने से ही जब राजा-महाराजा अपनों की मोक्ष के लिए हरिद्वार आते थे तब से ही एरिया वाइज अलग अलग तीर्थ पुरोहित को बाँट दिए गए थे. समय आगे बढ़ा तो क्षेत्र के सात साथ जाति के आधार पर और फिर गौत्र के आधार पर अलग अलग तीर्थ पुरोहित अपनी इस जिम्मेदारी को निभा रहे है. तो अगर आपको अपने पूर्वजो के हरिद्वार आने और उनके द्वारा दी गए दान को जानना है तो तीर्थ पुरोहित आपके स्थान ,जाति और गौत्र से आपको सब बता सकता है और दिखा भी सकता है.

