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अमेठी हो या रायबरेली, सारा खेल डर का है

आर्टिकल/इंटरव्यूअमेठी हो या रायबरेली, सारा खेल डर का है

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अमित बिश्नोई
ये चुनाव डर का है, “संविधान ख़त्म होने का डर, आरक्षण ख़त्म होने का डर, मंगल सूत्र छीन लेने का डर, संपत्ति मुसलमानों में बाँट देने का डर. हर तरफ डर का माहौल है. कांग्रेस कह रही है भाजपा डर पैदा कर रही है तो भाजपा बह्संख्यकों में कांग्रेस का डर पैदा कर रही है, कांग्रेस आ गयी तो ऐसा हो जायेगा, वैसा हो जायेगा। हालाँकि डर की बात की शुरूआत तो कांग्रेस पार्टी की तरफ से हुई थी, भारत जोड़ो न्याय यात्रा में दो नारे निकले थे “नफरत के बाज़ार में मोहब्बत की दूकान” और “डरो मत”. राहुल गाँधी तब से लेकर अबतक लोगों से यही कहते आ रहे हैं कि डरो मत, इस बीच हज़ारों किलोमीटर की पैदल और बस से यात्रा भी कर डाली और कहते रहे “डरो मत. संयोग देखिये कि आज प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल में राहुल गाँधी से कह रहे हैं कि जो कहते थे डरो मत, आज मैं उनसे कहता हूँ भागो मत. प्रधानमंत्री के पास ऐसा कहने का पूरा कारण भी है और उनकी इस बात में दम भी है. कारण है राहुल गाँधी का अमेठी की जगह रायबरेली से लड़ने का फैसला।

वैसे तो देश में लोकतंत्र है, कोई भी कहीं से चुनाव लड़ सकता है लेकिन कुछ फैसले सन्देश वाले होते हैं. तीन बार अमेठी से सांसद बनने के बाद चौथी बार हारने से जब देश की राष्ट्रिय पार्टी का सबसे बड़ा नेता उस सीट को छोड़कर किसी और सीट पर भागता है तो उसे राजनीति की भाषा में मैदान से भागना ही कहते है। बेशक आपकी नज़रों में वो कोई रणनीति हो सकती, आपका कोई मास्टर स्ट्रोक हो सकता है लेकिन किसी भी आम आदमी की ऐसे फैसलों पर पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि हार का डर. राहुल गाँधी का अमेठी की जगह पर रायबरेली से लड़ना सिर्फ डर ही कहा जाएगा। हाँ अगर ये फैसला पहले से लिया गया होता तो शायद इस फैसले को डर का नाम लोग न देते लेकिन अंत समय में ये फैसला आया. कल रात तक अमेठी का हर व्यक्ति, अमेठी छोड़िये देश का हर व्यक्ति यही जानता था कि राहुल गाँधी अमेठी से चुनाव लड़ने जा रहे हैं मगर आज सुबह जब नामों का एलान हुआ तो सारा खेल बदला हुआ नज़र आया, डर का खेल, हार के डर का खेल.

इस फैसले के बाद अब जो खबरे निकल आ रही हैं उनके मुताबिक राहुल गाँधी किसी भी हालत में स्मृति ईरानी के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ना चाह रहे थे. वो ये सन्देश नहीं देना चाह रहे थे कि भाजपा वाले ये कहें कि वायनाड में हार के डर से वो अमेठी वापस गए हैं. देर रात तक राहुल गाँधी चुनाव लड़ने पर राज़ी हुए लेकिन रायबरेली से. फिर इस बात का सारा आंकलन किया गया कि राहुल गाँधी के लिए रायबरेली की सीट कितनी सुरक्षित है, यहाँ तक कि देर रात सपा प्रमुख अखिलेश यादव से भी बात की गयी और उन्हें पूरी बात बताई गयी. अखिलेश से ये भी पूछा गया कि रायबरेली राहुल गाँधी के लिए कितनी सुरक्षित है. अखिलेश यादव ने उन्हें जीत के लिए आश्वस्त किया और कहा कि गाँधी परिवार को चुनाव ज़रूर लड़ना चाहिए, कम से कम एक व्यक्ति को हर हाल में लड़ना चाहिए। इस बातचीत के बाद ही राहुल गाँधी को रायबरेली और किशोरी लाल शर्मा को अमेठी से प्रत्याशी बनने का फैसला किया गया.

अमेठी और रायबरेली की अगर तुलना की जाय तो भाजपा रायबरेली में उतनी मज़बूत नहीं दिखती जितनी अमेठी में नज़र आती है. हालाँकि भाजपा का दोनों ही ज़िलों में मज़बूत काडर है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को अगर देखें तो अमेठी की पांच में से तीन सीटों पर भाजपा को कामयाबी मिली थी वहीँ रायबरेली की पांच में से सिर्फ एक सीट पर कामयाबी मिली। इन दोनों जगहों से कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली अलबत्ता कांग्रेस की सहयोगी समाजवादी पार्टी ने रायबरेली से चार और अमेठी से दो सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी, और अमेठी की जगह रायबरेली का चयन शायद इसी वजह से हुआ कि एक तो यहाँ पर सहयोगी दल को काफी बढ़त हासिल है और दूसरे 2019 की मोदी लहर में भी रायबरेली ने गाँधी परिवार की लाज बचाई थी. वैसे भी रायबरेली में कांग्रेस पार्टी को 20 चुनावों में से 17 में कामयाबी हासिल हुई है इसलिए अमेठी की तुलना में रायबरेली कांग्रेस पार्टी के लिए ज़्यादा भरोसेमंद और सुरक्षित सीट कही जा सकती है.

लेकिन बात यहाँ हार जीत की नहीं है , अच्छे आंकड़ों के बावजूद इस बात की गारंटी नहीं कि रायबरेली से सौ प्रतिशत राहुल गाँधी को जीत मिल ही जाएगी, वैसे भी अमेठी छोड़ने के फैसले ने राहुल गाँधी की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान तो लगा ही दिया है. राहुल गाँधी के हवाले से कई बार ये खबरे निकल चुकी हैं कि वो वायनाड को नहीं छोड़ेंगे। इसका मतलब ये भी हुआ कि दोनों जगहों से जीत हासिल करने पर राहुल गाँधी किस सीट को अपने पास रखेंगे, साफ़ नहीं है । वायनाड का तो मतदान हो चूका है, उनके पास तो अब कोई विकल्प नहीं है लेकिन रायबरेली वालों के पास तो विकल्प अभी मौजूद है. रायबरेली की जनता कैसे विशवास करे कि राहुल गाँधी को जिताने के बाद वो रायबरेली को अपनाएंगे, वायनाड नहीं जायेंगे। रायबरेली की जनता ये भी जानती है कि राहुल गाँधी ने रायबरेली से चुनाव लड़ने का फैसला अपनी ख़ुशी से नहीं बल्कि पार्टी की रणनीति के ऐतबार से किया है तो रायबरेली की जनता को भी पूरा हक़ है कि वो इस बारे में सोचे कि जिसे वोट देने जा रही है वो उसके साथ रहे, उसके पास रहे. डर तो उसे भी होगा कि जिसे वो जिता दे वो भाग न जाए. इसलिए हर कोई डरा हुआ है, नेता भी और जनता भी.

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