‘वोट की चोट’ का दबाव हुआ कारगर

उत्तराखंड‘वोट की चोट’ का दबाव हुआ कारगर

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‘वोट की चोट’ का दबाव हुआ कारगर

सरकार की कमजोर नब्ज पकड़कर आंदोलन को धार देते गए किसान नेता

ऊषा सिंह

बीजेपी की हर सरकार पांच साल चुनावी मोड में चलती है। केंद्र और यूपी सरकार की इसी कमजोर नब्ज को पकड़कर किसान नेताओं ने आंदोलन को धार दी। वे लगातार ‘वोट की चोट’ डर दिखाते गए। हालांकि आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने भी ‘नरम’-‘गरम’ हर तरीका अपनाया। किसान नेताओं पर  भी  कई आरोप लगे लेकिन सभी को साथ लेकर वे सरकार पर दबाव की राजनीति पर डटे रहे। इसी का नतीजा उनके पक्ष में आया और तीनों कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान हुआ।
 
जब आई आंदोलन खत्म होने की नौबत
आंदोलन की शुरुआत पंजाब और हरियाणा के किसानों ने की। उस समय यूपी के किसान उतनी तादद में नहीं थे। तब आंदोलन को छोटा बताने के लिए यह भी कहा गया कि चंद किसान हैं। यूपी के किसानों को कोई दिक्कत नहीं है। यहां तक कि खालिस्तानी और पाकिस्तानी जैसे आरोप भी उन पर लगे। उसके बाद 26 जनवरी को किसानों ने दिल्ली कूच का ऐलान किया और वहां लाल किले पर धार्मिक झंडे को लेकर विवाद हुआ। तब यह लगा कि आंदोलन खत्म हो जाएगा। संयुक्त मोर्चा के कुछ घटकों ने आंदोलन वापसी का ऐलान भी कर दिया। तभी अंतिम समय में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत वही टिक गए।

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टिकैत के आंसुओं ने दी आंदोलन को धार
टिकैत के आंसुओं ने किसानों को एक बार फिर इमोशनल कर दिया। उसके बाद आंदोलन को एक नई धार मिली। फिर से किसान उनके साथ जुड़ने लगे। इस घटना के बाद टिकैत ही आंदोलन के अगुवा बन गए। यह आंदोलन दिल्ली से निकलकर पश्चिमी यूपी में बढ़ता चला गया। लगातार किसान पंचायतें हुईं। इसमें लाखों की संख्या में किसान जुटने लगे। किसान नेताओं की इन महापंचायतों से विपक्ष का भी हौसला बढ़ा। आरएलडी और कांग्रेस भी अपनी-अपनी किसान पंचायतें करने लगीं। विपक्षी दल किसानों के हर मुद्दे पर उनके साथ खड़े  दिखे।
 
कर दिया बीजेपी को हराने का ऐलान
किसानों पर विपक्ष के साथ मिलीभगत के आरोप लगे लेकिन  राकेश टिकैत ने इसकी परवाह किए बगैर बीजेपी को हराने का ऐलान कर डाला। इसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल से की। हालांकि वहां उनके संगठन का बहुत ज्यादा असर नहीं है लेकिन वहां बीजेपी को पराजय मिली। उनका अगला निशाना यूपी चुनाव रहा। यहां भी लखनऊ आकर उन्होंने बीजेपी को हराने का ऐलान कर दिया। यहां उन्होंने किसी राजनीतिक दल का समर्थन करने की बात नहीं की लेकिन खुद सभी का साथ लिया। सभी विपक्षी दलों के आनुसंगिक संगठनों से मिले। सभी ने उनका साथ देने का  वादा भी किया। चुनाव नजीदक आते- आते उनके कदम पश्चिमी यूपी से लखनऊ की ओर बढ़ने लगे। अभी 22 नवंबर को लखनऊ में राष्ट्रीय किसान महापंचायत होने वाली है। इसमें भी मंच पर विपक्षी नेता नहीं रहेंगे लेकिन उनके आनुसंगिक संगठन तैयारी में जुटे हैं।

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हर मोर्चे पर दबाव में दिखी सरकार
किसान नेता इसी दबाव की राजनीति के तहत सरकार से अपनी मांगें मनावते गए। लखनऊ में संयुक्त मोर्चा ने प्रेस कांफ्रेंस कर गन्ना मूल्य बढ़ाने और बिजली बिलों का मुद्दा उठाया। उसके बाद प्रदेश सरकार ने गन्ना मूल्य बढ़ाया और बिजली बिलों पर ब्याज माफ कर दिया। इसी बीच लखमीपुर कांड हुआ। वहां किसान नेताओं ने जो मांगें रखीं, वो सरकार ने मान लीं। वहां तात्कालिक रूप से सरकार को सफलता मिली लेकिन संयुक्त मोर्चा के घटक संगठनों ने नए सिरे से रणनीति तैयार की। उसके बाद मुख्य आरोपित आशीष मिश्र की गिरफ्तारी हुई। अब भी किसान उनके पिता  और केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाए जाने की मांग कर रहे हैं। लखनऊ की महापंचायत में तीन कृषि कानूनों की वापसी के साथ ही अजय मिश्र को मंत्रिमंडल से हटाए जाने का मुद्दा अहम है। उससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह लखनऊ में हैं। इसी दौरान प्रधानमंत्री ने कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान भी कर दिया।

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