सुनील शर्मा
लो जी लो कर लो बात, यह भी कोई बात हुई, पहले तो कानून ले आए, जबरन लागू भी कर दिया, फिर उस पर रोक भी लगा दी और अब खुद ही उसे वापस भी ले लिया। अरे जब कानून लागू ही नहीं करने थे तो काहे को पूरे देश को हैरान-परेशान किया। सर्द रातों में ठंडी हवाओं के बीच किसानों को ठिठुरने पर मजबूर क्यों किया। रास्ते जाम क्यों करवाए, ट्रेने क्यों रूकवाई। अरे साहब जब आप को कानून वापस लेना ही लेना था तो थोड़ा पहले ले लेते, कम से कम किसान भाइयों को जान तो ना गंवानी पड़ती। उनके परिवारों को अपनों के बिछड़ने का दर्द तो न सहन करना पड़ता।
सुबह के समय ‘साहेब’ ने टीवी पर ऐलान किया कि और नहीं बस और नहीं, और कानून वापस ले लिए। लेकिन शर्मा जी के सवाल उनको परेशान किये हुए थे और उनका पत्रकार हृदय मानने को तैयार नहीं था। तो उन्होंने कागज-कलम उठाया और चल दिए साहेब के पास अपने सवालों का जवाब मांगने। ‘साहेब’ तक पहुंचना मुश्किल तो था मगर नामुमकिन नहीं और शर्मा जी तो ठहरे खांटी पत्रकार, सो कर लिया इंटरव्यू का जुगाड़। खैर ‘साहेब’ जी आए तो शर्मा जी ने पत्रकार वाले अंदाज में तुरंत सवाल दागा, आपने कानून वापस ले लिए तो उन्हें लागू क्यों किया था? लागू कर ही दिया था तो वापस क्यों लिया?
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शर्मा जी के पहले ही सवाल पर ‘साहेब’ थोड़ा कसमसाये, कुछ परेशान दिखे, फिर बोले, तो शर्मा जी आप क्या चाहते थे हम सरकार में ना रहें ? अरे बड़ी मुश्किल से तो सत्ता संभालने का मौका मिला है अब तीन कानूनों के पीछे क्या उसे भी गंवा दें ? अरे जहां जाओ वही किसान पीछे लग जाते हैं। हमारी पार्टी के नेता ना सभा कर पा रहे हैं ना ही बैठक। तो शर्मा जी चुनाव की तैयारी होगी कैसे, जनता के बीच जाएं भी तो कैसे? हम तो बिना लड़े ही चुनाव हार जाएंगे। तो जैसे लागू किया था कानून, ‘अपनी मनमर्जी से’ वैसे ही वापस ले लिया। इसमें किसी और की मर्जी नहीं थी इसलिए जीत अब भी हमारी हुई है। हम कानून लाकर भी किसानों का भला सोच रहे थे और अब कानून वापस लेकर भी उसी का भला कर रहे हैं।
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‘साहेब’ जी के जवाब से असंतुष्ट शर्मा जी ने पूछा, इन कानूनों को आप पहले भी तो वापस ले सकते थे? अब ‘साहेब’ के चेहरे पर राजनीतिक मुस्कान आ गई और बोले, अरे शर्मा जी विपक्षी दलों से अगर हम किसानों का मुद्दा छीन लेते तो वह और नए मुद्दे तलाश लेते, हंगामा करते, सरकार पर सवाल उठाते। अब सारे दल एक ही मुद्दे के पीछे लगे रहे और उसी के दम पर चुनाव लड़ने और जीतने के सपने देखते रहे। अब ऐन मौके पर हमने उनकी टांग खींच ली। अब ढूंढते रहो नया मुद्दा, लड़ के दिखाओ चुनाव। उनको मुद्दा दिया भी हमने और छीना भी हमने।
यह राजनीतिक पहलू शर्मा जी को को कुछ समझ में तो आया मगर उनकी जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई थी सो बोले, लेकिन ‘साहेब’ इससे किसान तो परेशान हुए। सर्द रातों से लेकर तपती दोपहरी तक सड़कों पर पड़े रहे, लोगों की जान तक चली गई। क्या इसमें आपका दोष नहीं है?
‘साहेब’ ठहरे नेता, तुरंत रंग बदल कर दार्शनिक अंदाज में आ गये और बोले, शर्मा जी, जीना-मरना तो ऊपर वाले के हाथ में है। कब, कहां, कैसे, किस की मौत लिखी है यह तो वही जाने। और रहा सवाल किसानों का तो शर्मा जी यह बताओ की आजाद हिंदुस्तान में किसानों की सुनी कब गई? किसकी सरकार में किसान परेशान नहीं हुए, आंदोलन करने को मजबूर नहीं हुए? अरे सरकार कोई भी हो वह किसानों को अन्नदाता कहकर, कभी-कभार सम्मान कर के ही खुश कर देती है। इसके अलावा कभी किसी सरकार ने किसानों को कुछ दिया भी है? अब किसान को तो आदत है, सर्द रातों और तपती दुपहरी में अपने खेत में भी तो रहता है तो इस बार सड़कों पर बैठा गया। शर्मा जी इसके फायदे भी तो देखो, कितने लोगों को रोजगार मिला, कितने नए नेता उभर कर आए हैं, देश विकास की पटरी पर सरपट दौड़ रहा है। 26 जनवरी के बाद से दुनिया भर में किसान आंदोलन की चर्चा है और भारत विश्व फलक पर चमक रहा है। ‘साहेब’ का यह जवाब सुनकर शर्मा जी ने उठ जाना ही बेहतर समझा।
वह कमरे से बाहर तो निकल गए मगर उनका मन में सवाल उठ रहे थे की हर बार अपनी मर्जी से नियम, कायदे-कानून लाकर जबरन जनता पर थोपना क्या लोकतंत्र है? क्या किसी और की बातों को ना सुनना लोकतंत्र है? क्या देश के किसानों का अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर बैठना लोकतंत्र है? क्या किसानों पर लाठीचार्ज करना लोकतंत्र है या उनकी बात न सुनना लोकतंत्र है? और अगर यही लोकतंत्र है तो फिर तानाशाही किसे कहते हैं? जब लोकतंत्र के सत्ता सिंहासन पर तानाशाह विराजमान हो जाएं तो लोकतंत्र के मायने खत्म हो जाते हैं, और इस बार ऐसा ही हुआ है…

