अनूप मणि त्रिपाठी
कल देखा कि पार्क में लोग दौड़ रहे हैं। उनको देख कर मैं बहुत हैरान हुआ। बात साफ कर दूं, मुझे उनके दौड़ने पर हैरानी नहीं हुई। हैरानी इस बात पर हुई कि वे मास्क लगा कर दौड़ रहे थे। ‘सुबह की हवा, लाख रुपये की दवा’ यह कहावत मुझे याद आई। मगर ये तो हवा को आने से पहले उसको छान रहे थे। जबकि यह हवा निःसदेह सुबह की थी। आज सेहत बनाने के लिए केवल सुबह उठ कर दौड़ना ही जरूरी नहीं, दौड़ने के साथ नाक पर मास्क लगाना भी जरूरी है। जहां छोटी-छोटी बातों पर नाक कट जाने की परंपरा रही हो, वहां ऐसी बातों से हमारे यहां किसी की नाक नहीं कटती। सुबह की हवा जो काम मुफ्त में करती थी, अब लाख रुपये खर्च करके भी वह काम नहीं हो पा रहा। इसे कहते है सही मायनों में प्रगति!
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जब मैं यह सब देख रहा था, तब हवा का एक झोंके मुझसे टकराया और उस झोंके ने एक कहानी मेरे कान में डाल दी, जोकि अभी मैं आपके कान में उड़ेलने जा रहा हूं। उसकी कहानी सुनकर मेरी हवा तो टाइट हो गई थी। कहानी ही ऐसी थी! यह कोरी हवाबाजी नहीं है! कहानी बिना सुनें आप नहीं जान पाएंगे!
एक दिन की बात है कि बाजार में किसी के मुंह से सुना गया कि आजकल हवा बहुत खराब है। फिर क्या था, यह बात निकली नहीं कि हवा की तरह पूरे बाजार में फैल गई। जो जिसका खास होता, वह उसी से कहता कि भई आजकल हवा बहुत खराब है। जल्द ही जितने मुंह मगर उतनी बात वाली की जगह, जितने मुंह मगर एक ही बात वाली स्थिति वहां हो गई। एक अजीब-सा माहौल छा गया। बरसों से जाने-पहचाने चेहरे अजनबी से लगने लगे। सारी बातें झूठ-बेइमानी लगने लगीं। सिर्फ एक बात को छोड़कर कि आजकल हवा बहुत खराब है।
आजकल से यही बात कहीं कोई किसी के पीठ पीछे कह रहा था, तो कहीं कोई किसी के कान में। यह बात कहने के अंदाज जुदा-जुदा थे, मगर सबका आशय एक ही था कि आजकल हवा बहुत खराब है। यकायक लोगों को अपनी बिरादरी याद आने लगी। लोग एक दूसरे का कुशलक्षेम पूछने लगे। ‘आजकल हवा बहुत खराब है’ के इस एक वाक्य ने सरस जीवन के वाक्य का विन्यास ही बिगाड़ दिया। कुछ लोगों को लगा उनके जीवन का पूर्णविराम आ चुका है, तो कुछ ने सोचा कि संधि-विच्छेद करने का यही सही वक्त है। इस क्रम में कुछ छतों पर ईंट-गुंमे जमा हो गए, तो कुछ छतों पर छोटे-बडे़ डंडे। अगर कोई छत इनसे खाली थी, तो वहां पेट्रोल या किरोसीन से भरी शीशियां रखी हुईं थीं।
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अब ऐसे हवा खराब के माहौल में एक खबर आंधी की तरह सनसनाती हुई आ गई। पता चला कि सुबह से अब्दुल घर नहीं पहुंचा। यह खबर अपने में आधी थी, हां मगर जहां ये सुनाई गई थी, वहां वह अपने संदर्भ-व्याख्या सहित पूरी थी। अब्दुल के साथ आनंद भी सुबह से घर से निकला था, मगर वह भी अभी तक अपने घर नहीं पहुंचा। सबको शंका हुई। पहले ही सचेत किया गया था कि आजकल हवा बहुत खराब है, मगर इन मांओं ने नहीं मानी, ‘कलेकटट्टर’ बनाने भेज दिया ‘इस्कूल’। अब भूगतो!
दोनों ओर से खोजहट शुरु हो गई। और भविष्य में होने वाली किसी अनिष्ट के चलते दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी कमर कस ली। बच्चे ढूंढने के उपक्रम में कोई पक्ष दूसरे पक्ष से टकरा जाता, तो उसके आंखों में तूफान उतर आता। और यह तूफान हवा का नहीं गुस्से और अविश्वास का होता। वाकई हवा बहुत खराब हो चुकी थी… आज तो कुछ ज्यादा ही!
खोजते-खोजते अचानक पता चलता है कि दोनों को कब्रिस्तान के पास देखा गया और यह कब्रिस्तान कस्बे के शुरू होने से पहले पड़ता था। यह खबर पक्की थी। क्योंकि यहां तो पहले से ही हवा खराब थी और दूसरे यह खबर एक अस्सीय वर्षीय काका ने दी थी, जो वहीं कब्रिस्तान के पास अकेले ही रहते थे।
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फिर क्या था! देखते ही देखते कस्बे से दो धराएं फूट पड़ीं । और दोनों की दोनों बहुत वेगवान। इन दोनों धराओं के अपने-अपने रंग थे और अपने-अपने नारे। और सबसे कमाल की बात यह कि ये दोनों धाराएं साथ-साथ समानांतर चल रही थीं।
कब्रिस्तान पहुंच कर दोनों ओर की धराएं स्तब्ध रह गईं। दृश्य ही कुछ ऐसा था। दोनों बच्चे (नाम एक बार फिर याद दिला दूं जिनमें से एक का नाम आनंद था तो दूसरे का नाम अब्दुल) दोनों वहीं मिले। एक धारा ने अब्दुल को देखा तो दूसरी धारा ने आनंद को। दोनों धराएं इस वक्त जो कुछ भी देख रही थीं, उसे देखना कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें ऐसा कुछ देखना पडे़गा।
अब्दुल अपने स्कूल वाली बोतल में चपलता से पास की गढ़इया से पानी लाकर बार-बार उस पेड़ की डाली पर डाल रहा था, जिसके ईद-गिर्द से आनंद अपने नन्हें-नन्हें हाथों से मिट्टी हटा रहा था। देखने से साफ पता चल रहा था कि दोनों बच्चे एक पौधा लगा रहे हैं।
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‘पापा कह रहे थे कि आजकल हवा बहुत खराब हैं!’ पेड़ की डाली को दोनों हाथों से थामते हुए गोल-गोल मुंह बनाते हुए आनंद बोला।
‘मेरे अब्बू ने भी यही कह रहे थे!’ बहुत मासूमियत से सिर हिलाते हुए अब्दुल बोला।
‘लेकिन अब हवा साफ होगी….हमने पेड़ जो लगाया है!’ दोनों चहकते हुए एक साथ बोले।
यह दृश्य देखकर दोनों घराएं जो बहुत रवानगी से बहती चली आ रही थी, अब वे सहसा सिकुड़ने लगी थीं….

