अमित बिश्नोई
टीम इंडिया के टी 20 कप्तान हार्दिक पंड्या का कहना है कि वो धोनी के दौर में टीम को पहुँचाना चाहते हैं. उनके कहने का मतलब यह है कि वो भी धोनी की तरह लोगों को चौंकाने वाले फैसले ले सकते हैं जो पहले से तय न हों और जो मैदान पर हालात के हिसाब से लिए गए हों. उनका कहना था कि टीम की ज़रुरत के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं चाहे उसके लिए उन्हें धोनी ही क्यों न बनना पड़े. कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि टीम को सिर्फ जीतते हुए ही देखना चाहते हैं.
हार्दिक का इरादा बुरा नहीं है लेकिन धोनी बनना आसान भी नहीं है. हालाँकि ऐसा बनने की ख्वाहिश रखना टीम के लिए बहुत अच्छी बात है. क्योंकि एक बात तो तय है कि अगर विश्व कप खिताब चाहिए तो धोनी जैसी सोच और किस्मत चाहिए। यहाँ पर हार्दिक की सोच तो धोनी जैसी दिख रही है लेकिन क्या किस्मत भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करेगी जैसी धोनी के साथ करती थी. धोनी को कैप्टन कूल के साथ किस्मत का भी धनी कहा जाता था. धोनी के कैरियर में ऐसी कई महत्वपूर्ण कामयाबियां मिली जब खेल से ज़्यादा किस्मत ने साथ निभाया। 2007 का पहला टी 20 विश्व कप इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जिसने वो मैच देखा होगा उसे जोगिन्दर सिंह का अंतिम ओवर और मिस्बाहुल हक़ का लैप शॉट बहुत अच्छी तरह याद होगा।
बहरहाल कल के मैच में विशाल जीत के बाद बुलंद हौसलों के साथ हार्दिक ने जो बातें कहीं वो उनके आत्मविश्वास को दर्शाती हैं. उनके कथन से साफ़ लगता है जैसे वो कहना चाह रहे हों कि उन्हें भी धोनी की तरह दबाव से निपटना आ गया है हालाँकि कप्तान के तौर पर उनका कैरियर अभी बहुत छोटा है लेकिन उन्हें अगले टी 20 विश्व कप के लिए ज़िम्मेदारी दी गयी है तो उस ज़िम्मेदारी का उन्हें एहसास भी है.
हार्दिक कहते हैं कि ज़रुरत पड़ने पर टीम की भलाई के लिए वो अपने स्ट्राइक रेट से समझौता भी कर सकते हैं, कहने का मतलब मुश्किल हालात में सयम से बल्लेबाज़ी कर सकते हैं जैसा कि उन्होंने लखनऊ के मैच में दिखाया भी. टीम का हित सर्वोपरि है और उसके लिए कोई समझौता नहीं, जो खिलाडी जिस मैच के लिए फिट उसे मौका मिलेगा, यह सोच हार्दिक स्पष्ट कर चुके हैं. कुछ इसी तरह की सोच धोनी की भी थी, तब कुछ बड़े खिलाडियों को टीम से बाहर का रास्ता भी दिखाया गया था. टी 20 विश्व कप को लेकर कुछ वैसा ही काम इस वक्त भी हो रहा है. रोहित और विराट जैसे बल्लेबाज़ बाहर हो चुके हैं, मोहम्मद शामी किनारे किये जा चुके हैं.
टीम में हार्दिक ने हर खिलाडी को एक भूमिका दे रखी है और उस भूमिका को निभाने के लिए छूट भी, भले ही उसमें नाकामी मिले। हार्दिक का यह कहना कि अगर हारेंगे भी तो अपनी शर्तों पर हारेंगे, मतलब उन्हें अपने फैसलों पर पछतावा नहीं होगा, जैसे धोनी को कभी नहीं हुआ. बल्लेबाज़ों को खुली छूट मिली हुई है. कल के मैच में ही शुभमन गिल का एक नया रूप नज़र आया, राहुल त्रिपाठी को अपनी जगह जाने का डर नहीं है, वो मैदान पर कप्तान की रणनीति को ही अपना रहे हैं, आउट भी रहे हैं लेकिन उन्हें मालूम है कि वो आगे भी प्लान का हिस्सा बने रहेंगे। चहल बहुत प्रभावी हैं मगर कुलदीप में ज़्यादा विविधता हार्दिक को दिख रही है. हार्दिक को रफ़्तार की अहमियत मालूम है इसलिए मंहगे होने के बावजूद उमरान मलिक पर भरोसा है. बहरहाल हार्दिक धोनी बनना चाहते हैं तो उनके इस फैसले का स्वागत करना चाहिए और उनका हौसला भी बढ़ाना चाहिए क्योंकि देश को अगर हार्दिक के रूप में एक और धोनी मिल जाए तो इससे अच्छी बात और क्या होगी।

