अजय श्रीवास्तव
प्रियंका गांधी में हमेशा से ही इंदिरा गांधी का अक्स देखा गया। हालांकि प्रियंका को आयरन लेडी कहना फिलवक्त अतिश्योक्ति होगी, कारण यह है कि प्रियंका ने अभी तक ऐसी कोई संविधानिक पोजीशन हासिल नहीं की है, जिसमें वह अपनी पॉलीटिकल-विल दिखा सकीं हों। हां, इतना अवश्य है कि वह जो ठान लेतीं हैं, कर डालतीं हैं। यह बात अलग है यूपी के कांग्रेसी उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बतौर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि, राहुल-प्रियंका राष्ट्रीय राजनीति के चेहरे हैं। देश को तीन प्रधानमंत्री देने वाले नेहरु-गांधी परिवार की वंशज हैं। माडर्न स्कूल, कॉन्वेंट ऑफ जीसस एण्ड मैरी, नई दिल्ली से अपनी शिक्षा हासिल करने वाली प्रियंका गांधी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान विषय से ग्रेजुएशन भी किया है।
प्रियंका गांधी देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी की संतान हैं। प्रियंका की दादी इंदिरा गांधी और नाना जवाहर लाल नेहरू भी भारत के प्राइम मिनिस्टर रह चुके हैं। दादा फिरोज गांधी भी एक नामचीन संसद सदस्य थे और परनाना, मोतीलाल नेहरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक अहम शख्सियत के लीडर थे।
राजीव गांधी की मौत के बाद कांग्रेस केन्द्र में बहुमत में आयी और सोनिया गांधी का नाम प्रधानमंत्री के चला, लेकिन सोनिया गांधी ने पीएम बनने का लालच नहीं दिखाया। कुछ इसी तरह का व्यवहार और सोच प्रियंका गांधी में भी हमेशा नजर आया। कांग्रेस से बार-बार प्रियंका को राजनीति में लाने की उठती आवाज के बावजूद उन्होंने अपनी शादीशुदा जिंदगी को पटरी लाकर और बच्चों के बड़ा होने का इंतजार ही किया। इस बीच राजनीतिक परिपक्वता वह हासिल करतीं रहीं। किसी पद का लालच किये बगैर वह हर मौके पर पार्टी और भाई राहुल के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ीं दिखीं।
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गौरतलब है कि, साल 1999 के एक चुनावी अभियान के दौरान, बीबीसी के लिए एक इंटरव्यू में प्रियंका ने कहा था कि, मेरे मन में यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि राजनीति पॉवरफुल नहीं है, बल्कि पब्लिक ज्यादा खास है और मैं उनकी सेवा राजनीति से बाहर रहकर भी कर सकती हूं।
इस मंशा के बावजूद प्रियंका गांधी ने अपनी मां सोनिया और भाई राहुल के निर्वाचन क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में हमेशा दौरा किया और वहां लोगों से जुड़कर उन्होंने अपनी व्यक्तिगत इमेज भी डेवलप की। इसमें कतई शक नहीं कि, वह इन निर्वाचन क्षेत्रों की एक सर्वप्रिय पर्सनालिटी हैं। प्रियंका में एक ऐसा ग्लैमर है जो जनता को उनके इर्द-गिर्द खींच लाता है।
देखा जाय तो लगभग हर चुनाव में ही एक परम्परागत नारा बुलंद होता है- अमेठी का डंका, बेटी प्रियंका। वाकई प्रियंका गांधी खुद कांग्रेस की राणनीतिकार हैं। जो व्यक्तित्व का आंकलन कर कांग्रेस से चुनिंदा शख्सियतों को पार्टी से जोडऩे और उन्हें जिम्मेदारी देना खूब जानतीं हैं। इतना ही नहीं वह राहुल और व अपनी मां की चीफ पॉलीटिकल एडवाइजर भी हैं।
याद कीजिए 2004 के आम चुनाव में, प्रियंका ही अपनी मां की मिशन मैनेजर थीं। उन्होंने अपने भाई राहुल गांधी के भी इलेक्शन-मैनेजमेंट में हेल्प की थी। एक सच पूछिये तो जब-जब उनके सक्रिय राजनीति में आने का सवाल उठा , उन्होंने इतना ही कहा कि-राजनीति का मतलब जनता की सेवा करना है और मैं वह पहले से ही कर रही हूं।
बहरहाल, प्रियंका अब न केवल कई बरसों से सक्रिय राजनीति में हैं बल्कि पार्टी की महासचिव और उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी भी हैं। अब तो यूपी कांग्रेसियों ने उन्हे विधानसभा चुनाव 2022 के मद्देनजर बतौर सीएम-फेस भी घोषित कर दिया है। देखना यह है कि, आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में प्रियंका का पॉलिटिकल-ग्लैमर क्या गुल खिलाता है।

