लखनऊ। यूपी के चुनाव में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है। इन दोनों की दलों की मजबूती का आलम यह है कि अभी तक यूपी में चार बार सत्ता का स्वाद चखने वाली बहुजन समाज पार्टी को भी फाइट से बाहर माना जा रहा था। बसपा में एक के बाद एक हुई टूट ने इस मिथ को और मजबूती प्रदान की है कि वह लड़ाई से बाहर है। लेकिन, पिछले कुछ दिनों में हुए राजनीतिक उठापटक ने बसपा को एक बार फिर मुकाबले में लाकर खड़ा कर दिया है। इस बार बसपा के टिकट बंटवारे को लेकर कई जगहों पर चर्चा हो रही है। खासकर पश्चिमी यूपी में मायावती ने जिस तरह टिकट बंटवारे में सोशल इंजीनियरिंग दिखाई है, उसने एक बार फिर बसपा को चर्चाओं में लाकर खड़ा कर दिया है। इसके अलावा भाजपा, सपा और कांग्रेस के टिकट कटने के बाद कई दिग्गजों ने भी बसपा का दामन थामा है, जिससे वहां का सियासी समीकरण बदलता हुआ दिखाई देने लगा है।
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टिकट बंटवारे में सोशल इंजीनियरिंग
बसपा ने अभी तक कुल 109 उम्मीदवारों का आधिकारिक ऐलान किया है। दो चरणों के लिए पश्चिमी यूपी के जिन जिलों में मतदान होना है वहां दलित, जाट और मुसलमानों की संख्या निर्णायक स्थिति में है। आंकड़ों की बात करें तो यहां सबसे ज्यादा 22 फीसदी दलित हैं। उसके बाद 20 फीसदी जाट और करीब 19 फीसदी मुसलमान हैं। बसपा ने दूसरी लिस्ट में 51 प्रत्याशियों में से 23 मुसलमानों को टिकट दिया है तो वहीं पिछड़े वर्ग के 13, 10 दलित और पांच सवर्णों को चुनावी मैदान में उतारा है। मायावती ने ओबीसी में सबसे ज्यादा जाट प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हर चुनाव की अपेक्षा बसपा ने इस बार टिकटों में जातिय समीकरणों का सबसे अच्छा प्रयोग किया है। ऐसे में किसान आंदोलन के बाद बीजेपी के प्रति उभरी नाराजगी और सपा के साथ गठबंधन में टिकटों की मारामारी का लाभ बसपा को मिल सकता है।
छिटकता वोट बैंक वापसी के मूड में
बसपा के वोट बैंक पर नजर डालें तो 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 30.43 फीसदी वोट पाकर 207 सीटें अपने नाम की थीं। उसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 25.91 फीसदी वोट मिला था और वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 22.23 प्रतिशत मत हासिल हुआ था। 2017 में बसपा को सपा से ज्यादा वोट हासिल हुए थे लेकिन सीटों में काफी अंतर देखने को मिला था। बसपा को जहां मात्र 19 सीटें मिलीं थीं तो वहीं सपा को 47 सीटों पर विजय हासिल हुई थी। बसपा में एक के बाद एक बड़ नेताओं ने किनारा किया है, ऐसे में यह माना जा रहा था कि इस बार उसको काफी नुकसान होगा। दलितों का एक बड़ा तबका बसपा को कमजोर मानकर सपा को उम्मीद की निगाह से देख रहा था, लेकिन चंद्रशेखर आजाद के प्रकरण के बाद अखिलेश के प्रति नजरिया काफी हद तक बदलता हुआ दिख रहा है। वहीं टिकट वितरण में जातीय समीकरणों को देखते हुए बसपा का कोर वोट बैंक जाने से पहले ही वापस आता दिखाई देने लगा है। गौरतलब कि यूपी में दलितों का वोटबैंक करीब 22 फीसदी है। जिसमें से करीब 80 फीसदी वोटबैंक अभी बसपा के साथ माना जा रहा है।
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दूसरे दलों के नेताओं की आमद से बदला सियासी समीकरण
सपा, भाजपा और कांग्रेस के नाराज नेताओं के लिये बसपा ने दरवाजे खोल दिये हैं। हाल ही में सहारनपुर में इमरान मसूद के भाई नोमान मसूद ने रालोद से बगावत कर बसपा का दामन थामा है। मायावती ने उन्हें टिकट दिया है। यहां पर दलित-मुस्लिम गठजोड़ बसपा को चमत्कारिक परिणाम दे सकता है। वहीं मुजफ्फरनगर में पूर्व गृहमंत्री सईदुज्जमा के बेटे सलामन सईद भी बसपा के साथ आ गये हैं। इसके अलावा मथुरा में एस के शर्मा, आगरा में भाजपा के कई बड़े नेताओं ने बसपा का दामन थामकर सियासी मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।
पिछले चुनाव के आंकड़े भी बसपा के पक्ष में
पिछले चुनावों पर नजर डालें तो पहले चरण करीब 58 सीटों पर मतदान होगा। पिछली बार बसपा यहां करीब 30 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी। वहीं दूसरे चरण की 12 सीटों पर बसपा दूसरे नंबर पर थी। यह आंकड़ा सपा से ज्यादा है। ऐसे में बसपा को उम्मीद है कि दूसरे और पहले नंबर का फर्क काफी हद तक मिटेगा। अगर बीजेपी के वोटबैंक में सेंधमारी होती है तो बसपा पहले और दूसरे चरण की करीब 39 फीसदी सीटों पर सबसे मजबूत बन सकती है।
गठबंधन के असमंजस से बसपा को लाभ
पश्चिमी यूपी की कुछ सीटों पर सपा गठबंधन असमंजस में है। कुछ सीटों पर गठबंधन के दलों ने अपने-अपने प्रत्याशी उतार दिये हैं। इसके अलावा इसके अलावा सपा और भाजपा ने जहां पर जातिय समीकरणों को देखते हुए एक ही समाज के लोगों को टिकट दिया है तो बसपा ने वहां पर दूसरे समाज का प्रत्याशी उतारकर दांव खेला है। उसका यह दांव कारगर साबित हो सकता है।
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मायावती की जनसभाओं से बदलेगा रुख!
मायावती ने 2 फरवरी को आगरा में जनसभा का ऐलान किया है। ऐसा माना जा रहा है कि मायावती के बाहर निकलने के बाद बसपा के समर्थकों में जोश भरेगा। इसका लाभ चुनावी मैदान में भी दिख सकता है। मायावती ने अभी तक एक भी इस चुनाव के लिए सियासी रैली नहीं की है। ऐसे में मायावती के बाहर निकलने के बाद कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ेगा और लाइमलाइट भी मिलेगी।
बैठकों का मिलेगा लाभ
बसपा मुखिया के निर्देश पर बसपा की सभी जिला इकाईयां बैठकें कर रहीं हैं। मायावती लगातार इसकी फिडिंग ले रहीं हैं। इन बैठकों का भी असर दिख सकता है। इसके अलावा कार्यकर्ता घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं। हालांकि बसपा मीडिया की लाइमलाइट से दूर है, ऐसे में उसकी चर्चा फिलहाल नहीं दिख रही है।

