प्रियंका की मांग जायज पर छात्रों तक ही सीमित क्यों

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प्रियंका की मांग जायज पर छात्रों तक ही सीमित क्यों

प्रियंका गांधी ने सीबीएसई परीक्षाएं रद्द करने के लिये शिक्षा मंत्री को लिखा पत्र
कहा, छात्रों के संक्रमित होने पर सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड हो जिम्मेदार
पश्चिम बंगाल, केरल चुनाव से लेकर पंचायत चुनाव के खिलाफ नहीं उठी कोई आवाज

सुनील शर्मा

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने सीबीएसई बोर्ड परीक्षा आयोजित किये जाने पर बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित होने की जो आशंका जाहिर की है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रियंका गांधी ने किसी भी परीक्षा केंद्र पर बड़ी संख्या में छात्रों के संक्रमित होने की स्थिति में सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को जिम्मेदार ठहराये जाने की मांग भी की है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि देश में कोविड-19 के एक लाख से अधिक मामले सामने आ रहे हैं, लाखों बच्चे और उनके माता पिता ने महामारी की दूसरी लहर के बीच परीक्षा केंद्रों पर एकत्र होने के बारे में डर एवं आशंका जताई है।

देश में कोरोना संक्रमण के बढ़ते रिकार्डतोड़ केसों को देखते हुए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की चिंता और मांग जायज लगती है। मगर क्या प्रियंका गांधी इस बात के लिये देश की जनता को आश्वस्त कर सकती हैं कि पश्चिमी बंगाल-केरल विधानसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश में होने जा रहे पंचायत चुनाव में उमड़ने वाली भीड़ कोरोना संक्रमण को बढ़ावा नहीं देगी। क्या चुनाव प्रचार से लेकर मतदान तक इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एकसाथ जुटना कोरोना संक्रमण का प्रसार और तेज नहीं करेगा। क्या कांग्रेस महासचिव यह कहने की हिम्मत रखती हैं कि जिन राज्यों में चुनाव होने के बाद कोरोना संक्रमण बढ़ेगा तो उसका जिम्मेदार वहां चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों को ठहराया जायेगा। क्या उनको पश्चिमी बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश में रहने वाले लोगों के जीवन की चिंता नहीं है या सिर्फ मुद्दे उठाकर सरकार को घेरे रखना और जनता की सहानाभुति बटोरना ही उनका लक्ष्य है।

निःसंदेह एक महिला और मां भी होने के नाते प्रियंका गांधी अभिभावकों की चिंताओं को बेहतर समझती हैं। मगर उनकी चिंता का सिर्फ छात्रों तक सीमित होना वर्तमान कोरोना संक्रमण काल में उचित प्रतीत नहीं होता। प्रियंका गांधी ने शिक्षा मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि ‘‘राजनीतिक दलों के नेता के तौर पर बच्चों की सुरक्षा और उनका मार्गदर्शन करना हमारी जिम्मेदारी है। निःसंदेह है, मगर राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी पूरे देश के नागरिकों की है। सिर्फ सीबीएसई के छात्रों ही नहीं बल्कि शिक्षा ग्रहण कर रहे प्रत्येक विद्यार्थी, इस देश के नवजात शिशुओं से लेकर वृद्धजनों तक के जीवन की रक्षा करना प्रत्येक राजनीतिक दल का कर्तव्य है चाहे वह सत्ता में हो या नहीं। देशवासियों के जीवन के सवाल पर किसी भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से दूर रहना राजनीतिक दलों का धर्म है लेकिन वर्तमान में सत्तारूढ पार्टी से लेकर विपक्षी दल तक अपने धर्म से विमुख नजर आ रहे हैं।

वर्तमान में देश के राज्य पश्चिमी बंगाल और केरल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। कांग्रेस भी इन राज्यों में मजबूती से चुनाव लड़ रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इन राज्यों में अनेक रैलियों को संबोधित कर चुके हैं और उनकी रैलियों में उमड़े लाखों लोगों ने उनको अपना समर्थन भी दिया है। लेकिन क्या इन राज्यों में रहने वाले लोगों को इन चुनावी रैलियों से कोरोना संक्रमण का शिकार होने का खतरा नहीं है। और बात सिर्फ कांग्रेस या प्रियंका गांधी तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस देश में सत्तारूढ पार्टी भाजपा और तमाम विपक्षी दलों पर भी सवाल उठते हैं कि आखिर कोरोना संक्रमण के खतरनाक स्तर पर पहुंच जाने के बावजूद क्यों नहीं वह इन राज्यों में होने वाले चुनाव पर अस्थायी रूप से रोक लगाने की मांग करते हैं। क्या उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा लोगों के जीवन से बढ़कर है या लोगों के जीवन की चिंता दिखावटी और वोट बटेरू मात्र है।

यहां पर गौर करना होगा कि कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों का स्वागत खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने करते हुए उन्हें तमाम सुविधाएं भी उपलब्ध करायीं थीं। क्या इतनी बड़ी संख्या में किसानों के एक साथ बैठने से कोरोना फैलने का खतरा नहीं था। कांग्रेस, आप, रालोद, समाजवादी पार्टी से लेकर अनेक राजनीतिक संगठनों ने धरनारत किसानों के पास पहुंच कर आंदोलन को समर्थन दिया, क्या किसी भी पार्टी ने इससे कोरोना फैलने की बात कही। गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में किसानों के घुस जाने के बाद बदले घटनाक्रम में किसानों की सहानाभुति को अपने पाले में खींचने के लिये बेताब राजनीतिक दलों ने उत्तर प्रदेश में अनेक महापंचायतों और रैलियों का आयोजन किया जिसमें लाखों की भीड़ उमड़ी। और संभवत उत्तर प्रदेश में कोरोना को प्रसार तेज होने का मुख्य कारण भी यही रैलियां हो सकती हैं। क्या देशवासियो के हित में सोचने का दावा करने वाले किसी भी राजनीतिक दल ने कोरोना काल में महापंचायत या रैलियां आयोजित किये जाने का विरोध किया। क्या उत्तर प्रदेश में कोरोना फैलने का जिम्मेदार लाखों की भीड़ इकट्ठा करने वाले राजनीतिक दलों को ठहराया जा सकता है।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश कोरोना संक्रमण से जुझ रहा है। हर दिन बढ़ती कोरोना मरीजों की संख्या पुराने रिकार्ड धवस्त करती जा रही है। इसी कोरोना के खौफ के बीच प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने का ऐलान कर दिया गया। इस बात का किसी भी राजनीतिक पार्टी ने विरोध नहीं किया और सभी अपने प्रत्याशियों को चुनावी रणभूमि में उतारने के लिये तैयार करने में जुट गये। सरकार पंचायत चुनाव में कोविड गाइडलाइन का पालन कराने का दावा जरूर कर रही है मगर हकीकत सब जानते हैं कि सरकारी कार्रवाई सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह जायेगी। पंचायत चुनाव तो वैसे ही होंगे जैसे अब से पहले होते आये हैं। यानी भीड़ भी होगी और प्रचार भी होगा। दावतें भी होंगी और जश्न भी मनेगा। चंद दिखावटी कार्रवाई या चालान काटने के बाद पुलिस-प्रशासन सिर्फ हाथ बांधे खड़ा होगा।

अगर राजनीतिक दलों को वास्तव में ही देश में बढ़ते कोरोना संक्रमण और उससे देशवासियों को होने वाले जान के खतरे की परवाह है तो उन्हें देश में होने वाले चुनावों पर अस्थायी रूप से रोक लगाने की मांग करनी चाहिये। वर्तमान में अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को दूर रखकर देशवासियों का जीवन बचाने के बारे में सोचना चाहिये। केंद्र में सत्तारूढ पार्टी भाजपा को भी इस मामले में पहल कर राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करना चाहिये। क्योंकि चुनाव तो फिर भी आ जायेंगे लेकिन चला गया जीवन लौट कर कभी वापस नहीं आयेगा। चंद लोगों की राजनीतिक महत्वकांक्षा लाखों जीवन पर भारी नहीं पड़नी चाहिये। यही राजनीतिक दलों का कर्तव्य और राजनीति का धर्म होने के साथ देशवासियों के जीवन की रक्षा हेतु आवश्यक भी है।

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