दिलों की खटास कम हो तब यूपी में बनेगी बीजेपी की राह

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दिलों की खटास कम हो तब यूपी में बनेगी बीजेपी की राह

  • किसान आंदोलन तो खत्म हुआ लेकिन कई सवाल अभी बाकी

ऊषा सिंह

एक साल से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसान आंदोलन समाप्त हो गया। आजाद भारत में इतने लम्बे समय तक चलने वाला यह आंदोलन कई सवाल भी छोड़ गया है। क्या किसानों के मुद्दे अब खत्म हो गए? क्या किसान अब आंदोलन नहीं करेंगे? क्या यूपी समेत चुनाव वाले पांच राज्यों में बीजेपी की राह आसान हो गई? ये सवाल जरूर सरकार, विपक्ष, किसान और आम जनता के मन में जरूर होंगे। इन सवालों को जानने के लिए हमें इस आंदोलन की प्रकृति, शुरू होने, इसे दबाए जाने के सारे प्रयास विफल होने से लेकर इसके  समाप्त होने तक के सभी पहलुओं को समझना होगा।

 
पंजाब-हरियाणा से दिल्ली की सीमाओं तक

यूं तो देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान आंदोलन पहले से चल रहे थे। उसके बाद पंजाब और हरियाणा में किसानों  ने आंदोलन शुरू किया। वहां से किसान आंदोलन को धार मिली। कई महीने ट्रेनें रोकीं। इस पर सरकार ने वहां की ट्रेनें  ही रद कर दीं। किसानों के साथ ही वहां की सरकार पर दबाव बनाया कि ट्रेनें चलवानी हैं तो आंदोलन खत्म कराइए। उसके बाद यह आंदोलन पंजाब और हरियाणा से  निकलकर दिल्ली की सीमाओं पर  पहुंच गया। वहां यूपी और अन्य प्रदेशों के किसानों का भी साथ मिला। इस इस आंदोलन को नकारने के लिए भी कहा गया कि सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसान हैं, यूपी और अन्य राज्यों के किसानों को इन कानूनों से कोई  दिक्कत क्यों नहीं है?

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जब पलट गया पासा

आंदोलन और तेज हुआ तो खालिस्तानी और पाकिस्तानी जैसे सम्बोधनों से किसानों को नवाजा गया लेकिन आंदोलन रफ्तार पकड़ता गया। आंदोलन को खत्म कराने की एक कोशिश 26 जनवरी को हुई जब कुछ लोगों ने लाल किले पर धार्मिक झंडा फहरा दिया। पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज किया और किसानों को अराजक बताने की कोशिश हुई। इस प्रयास के बाद सरकार आंदोलन खत्म कराने की दहलीज पर भी पहुंच गई। कुछ किसान  संगठन आंदोलन से अलग हो गए। इस पर संयुक्त मोर्चा भी सहमत हो गया था। तभी किसान नेता राकेश टिकैत  पर हमले की कथित साजिश रची गई। सभी टिकैत के आंदोलन खत्म  होने के ऐलान का इंतजार कर रहे थे लेकिन मामला उलट गया। टिकैत ने सरकार की साजिश का खुलासा करते हुए अपना दर्द बयां कर दिया। यह दर्द बयां करते हुए  टिकैत के आंसू छलक पड़े।
 
राजनीतिक दबाव से बैकफुट पर आई सरकार

यहां से किसान फिर एकजुट होने शुरू हुए और उन्होंने राजनीतिक दबाव बनाना शुरू कर दिया। पहले पश्चिम बंगाल में टिकैत ने बीजेपी का  विरोध किया। उसके बाद यूपी में विरोध का ऐलान कर दिया। यहां से सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता गया। इसी दबाव के बीच लखीमपुर की घटना हुई। इस घटना ने किसानों को और  आक्रोशित कर दिया। अब यह आंदोलन पश्चमी यूपी से आगे बढ़ते  हुए तराई और मध्य यूपी तक आ  गया। चुनाव से ठीक पहले इस तरह की घटना और फिर लखनऊ में किसान महापंचायत के आगे सरकार को झुकना पड़ा। लखनऊ महापंचायत से  ठीक पहले प्रधानमंत्री ने तीनों कानून वापस लेने का ऐलान कर दिया। यहीं से समझ आ गया कि सरकार अब बैकफुट पर है  और किसानों ने दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। उन्होंने अन्य मांगें रख दीं और उन पर लिखित आश्वासन मांगा। केंद्र सरकार इन  मांगों पर भी सहमत हो गई तो  किसानों ने  दिल्ली की सीमाओं से आंदोलन समाप्त करने का ऐलान कर दिया।

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मुद्दे अभी और भी हैं

अब आते हैं सवालों के जवाब पर। केंद्र सरकार के सामने किसानों की जो शर्तें थीं, वे पूरी हुई हैं लेकिन किसानों के मुद्दे अभी खत्म नहीं हुए हैं। किसान नेताओं ने साफ कहा है कि 15 जनवरी को वे फिर समीक्षा करेंगे कि सरकार ने उनकी सभी मांगें पूरी कर दी हैं। दूसरी बात ये भी साफ की है कि राज्यों के अलग-अलग जो मुद्दे हैं, वहां उन सरकारों से बात होगी। मतलब साफ है कि केंद्र सरकार के मांगें मानने के बाद दिल्ली की सीमाओं से आंदोलन खत्म हुआ है। यूपी में अभी बिजली बिलों में कटौती, गन्ना मूल्य का भुगतान, गन्ना मूल्य वृद्धि, 15 साल पूरान ट्रैक्टर की अनुमति जैसे कई मुद्दे बाकी हैं। किसानों को भी मालूम है कि चुनाव से अच्छा कोई वक्त नहीं होता अपनी मांगें मनवाने का। ऐसे में वे इनके लिए भी सरकार पर दबाव बनाएंगे। केंद्र सरकार से अपनी मांगें  मनवाने के बाद किसानों को अपनी ताकत का एहसास भी हो गया है।

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