सुनील शर्मा
लो जी लो कर लो बात, अपने बाबा जी कोरोना से जनता को बचाने के लिए इतनी मेहनत करते हैं मगर लोग हैं की खामियां निकालने में लगे रहते हैं। बाबा जी ने सबसे पहले यूपी की राजधानी को सुरक्षित बनाने की ठानी और लगा दी धारा 144, कोरोना काल के प्रतिबंध फिर से लगा दिए राजधानी में। मंदिरों में भी 50 से ज्यादा आदमी जुटने की इजाजत नहीं दी। यह सब बाबाजी लोगों को बचाने के लिए ही तो कर रहे हैं। लेकिन लोग हैं कि सवाल उठाते रहते हैं। अब जनता की मांग बढ़ी तो शर्मा जी को बाबा जी से बात करने के लिए मजबूर होना पड़ा और पहुंच गए इंटरव्यू के लिए।
परम ज्ञानी बाबा जी को अपने समक्ष देख शर्मा जी ने पूछा, बाबाजी आपने कोरोना-ओमिक्रान से जनता को सुरक्षित रखने के लिए मंदिरों में भी 50 से अधिक लोगों के जुटने पर पाबंदी लगा दी है। आपने छात्रों-कर्मचारियों के प्रदर्शनों पर भी रोक लगा दी है। मगर चुनावी रैलियों को लेकर आप की सरकार ने कोई आदेश जारी नहीं किया है। इसका क्या कारण है? क्या चुनावी रैलियों में कोरोना संक्रमण नहीं फैलेगा या नेताओं के भाषण जनता को कोई इम्यूनिटी बूस्टर डोज दे दे देंगे जिससे कोरोना उनको कोई नुकसान नहीं पहुंचायेगा।
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शर्मा जी के सवाल सुनकर बाबा जी ने शीतल जल का एक घूंट पिया और बोले, शर्मा जी सरकार जनता के लिए होती है और जनता ही सरकार को बनाती है। अब बताओ जनता को हम नजरअंदाज कैसे कर दें। शर्मा जी, कोरोना आया, चला गया, अब ओमिक्रान भी आकर एक दिन चला ही जायेगा। लेकिन इनके आने-जाने के चक्कर में अगर वोटर हाथ से चले गए तो हमारे हाथ कुछ ना आएगा। भैयाजी, बीमार आदमी का तो इलाज हम करवा देंगे लेकिन सत्ता से ही बाहर हो गए तो अपना इलाज कराने लायक भी न बचेंगे। इसलिए रैली में तो आने दो जनता को भी और कोरोना को भी। अरे भईया, हमें तो सबको ही देखना है, जनता को भी, कोरोना को भी और खुद को तो देखना ही देखना है।
शर्मा जी अगला सवाल दागते हुए कहा, लेकिन बाबाजी रैलियों में तो कोई कोविड प्रोटोकाॅल को फाॅलो ही नहीं करता। जनता की छोड़िए नेता भी मास्क लगाने को तैयार नहीं है। ऐसे में कैसे होगा कोरोना-ओमिक्रान से बचाव?
इस पर बाबा जी ने कहा, शर्मा जी आप तो जानते ही हो राजनीति तो खेल ही चेहरा चमकाने का है। अगर मास्क ही लगा लिया तो चेहरा पहचानेगा कौन? और चेहरा ही नहीं दिखा तो जनता कैसे याद रखेगी, क्यों देगी वोट? शर्मा जी, जान चली जाए पर राजनीति ना जाए, राजनीति अगर जाए तो जीया नहीं जाए। रही बात जनता की अब हम उनकी आंखों पर अपने रंग का चश्मा चढ़ाएं या उनके चेहरे पर मास्क? अरे शर्मा जी जनता को मास्क पहनाने को कहा तो हम ही चेहरा दिखाने के लायक नहीं बचेंगे। तो यह सब बातें आप रहने दो क्योंकि इस हमाम में सभी नंगे हैं। हम सरकार हैं तो क्या बाकी राजनीतिक दल भी तो लगतातर रैलियों किए जा रहे हैं। कोरोना के नाम पर हमारी सरकार को गलत ठहराने वाले अन्य राजनीतिक दलों के नेता अब क्यों नहीं कोरोना से जनता को बचा रहे हैं? क्यों बुला रहे हैं लाखों की भीड़, क्यों नहीं कहते कि चुनाव बाद में पहले कोरोना से बचाव करो। क्या किसी भी नेता ने कोरोना से बचाव के लिए फिलहाल रैलियां ना करने की बात कही है। नहीं ना, क्योंकि राजनीति सबको प्यारी है। जान जाती है तो जाए हम नेताओं का तो इलाज हो ही जाएगा। अब जनता का इलाज बंध जाये तो बंधता रहे हम कर भी क्या सकते हैं।
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बाबाजी का जवाब सुनकर शर्मा जी उठ खड़े हुए। इस बार उन्होंने सवाल नहीं किया बल्कि बाबा जी से कहा, जनता ने आपको सत्ता आपके लिए नहीं बल्कि अपने लाभ के लिए सौंपी थी। आप यदि बाकी दलों से अलग न होते तो सत्ता सिंहासन पर आप नहीं और ही लोग बैठे होते। आपको बेहतर समझा, सबसे अलग समझा इसलिये आपको जिताया, राज सिंहासन पर बिठाया। अब राजधर्म का पालन कीजिए और पूरे प्रदेश की जनता के जीवन को सुरक्षित बनाइए। बीमारी का इलाज करने के संसाधन तो जुटाइये मगर उससे बचाव के लिए कड़े कदम भी उठाइए। साहब सरकार तो हर 5 साल बाद आती-जाती है मगर जिसके अपने की जान चली जाती तो कभी लौट के नहीं आती। अगर दूसरे राजनीतिक दल उदाहरण नहीं पेश कर रहे हैं तो आप ही करके दिखाइए। यह जो पब्लिक है यह सब जानती है। अगर आप उदाहरण पेेश करेंगे तो जनता आपकी पूजा आपको वोट चढ़ा कर करेगी। अगर आप भी अन्य पार्टियों की तरह सोचेंगे तो जनता भी आपको उन्हीं की पंक्ति में खड़ी कर देगी। अब फैसला आपके हाथ में है की आप को राजनीति चाहिए या लोगों की जिंदगी। और फैसला जल्दी किजियेगा क्योंकि जनता को भी फैसला करना है…

