पारम्परिक खेती के बजाय केले की आधुनिक खेती अपना कर युवा किसान ने संवारा अपने परिवार का भविष्य
गांव में रहकर भी आधुनिक सुख सुविधाओं का उपभोग कर रहा पूरा परिवार
हापुड़। विभिन्न कंपनियों में नौकरी कर प्रति माह 25 से 30 हजार रुपये कमाने वाले तहसील धौलाना के एक युवक ने अन्त में खेती को अपना भविष्य संवारने का जरिया बनाया। उसकी मेहनत और सूझ-बूझ रंग लाई और वह लगभग 50 हजार रुपये प्रति बीघा प्रति वर्ष कमाने लगा। अब उसके पास वह सभी सुविधाएं हैं जो सामान्यतः एक लाख रुपये प्रति माह वेतन लेने वाले कर्मचारी उपभोग करते हंै। केले की आधुनिक खेती करने वाला यह युवा किसान गन्ना, गेहूं और धान की पारम्परिक खेती करने वाले किसानों के लिए भी आदर्श बन गया है।
धौलाना तहसील के ग्राम मिलक मढ़ैया निवासी जितेंद्र सिंह ने वर्ष 1997 में बीकॉम किया था। उसके बाद वह भी अन्य युवाओं की तरह नौकरी पाने की तलाश में शहर दर शहर भटकते रहे। काफी प्रयास के बाद उन्हें ट्विन पैक कंपनी में नौकरी मिल गई। इस कंपनी में कई वर्ष तक उन्होंने अपनी सेवाएं दीं। जिंदगी धीरे धीरे आगे बढ़ी और उन्हें जेपी एसोसिएट कंपनी में टिहरी में नौकरी करने का अवसर मिला। लेकिन व्यक्तिगत कारणों से वह जेपी एसोसिएट में अधिक समय तक सेवाएं नहीं दे सके। इस कारण उनका मन विचलित था। अपने भविष्य को लेकर वह काफी चिंतित थे। काफी सोच विचार के बाद अन्त में उन्होंने नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटकने के बजाय अपने गांव वापस लौटने का निर्णय लिया।
गांव में आकर पहले तो जितेंद्र सिंह ने कई वर्ष तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होने वाली पारम्परिक खेती गन्ना, धान और गेहूं का उत्पादन कर उससे होने वाली आय से किसी प्रकार अपने परिवार का पालन पोषण करते रहे। लेकिन उनके मन में तो कुछ नया करने और अपने परिवार को प्रथम श्रेणी के अधिकारियों के परिवार को मिलने वाली सुख-सुविधा उपलब्ध कराने की चाह थी। गेहूं और धान की फसल से होने वाली आय उनकी खेती की आवश्यकताएं पूरी कर पाती थीं और गन्ने की फसल से होने वाली आय से वह वर्ष भर अपने परिवार का किसी प्रकार भरण पोषण कर पाते थे। गन्ने के मूल्य का भुगतान भी कई माह बाद हो पा रहा था। अब उनका परिवार गांव में रहकर भी सभी आधुनिक सुख सुविधाओं का उपभोग कर पाने में सक्षम है।
केले की खेती से पहले ही वर्ष में हुआ दोगुना लाभ
जितेंद्र सिंह ने बताया कि एक दिन उन्हें किसान मेले में जाने का अवसर मिला। वहा मौजूद अधिकारियों ने किसानों को केले की खेती से होने वाले लाभ की जानकारी दी। घर आकर उन्होंने मेले में मिली जानकारियों पर चिंतन किया और केले की खेती करने का मन बना लिया। उन्होंने बिना कुछ परवाह किए परंपरागत खेती से हटकर खेती कर एक आर्थिक खतरा उठाने का निर्णय ले लिया। उन्होंने अपनी 45 बीघा कृषि भूमि में केले की पौध लगा डाली। उन्होंने केले की जी.9 किस्म की 6.6 फीट के अंतर पर 11 हजार 250 पौध लगा दी। इन पौधों की देखभाल और परवरिश में उन्होंने दिनरात एक किया और 14 महीने के बाद उनकी मेहनत रंग लाई।
उन्होंने बताया कि केले की पहली फसल से उन्हें गन्ने की फसल से होने वाली आय से दोगुना लाभ हुआ। गन्ने की खेती से एक बीघे से उन्हें 18 से 20 हजार रुपये प्रति वर्ष की आय हो पाती थी, जिसमें आठ से दस हजार रुपये की लागत आ जाती थी। कुल मिलाकर उन्हें प्रति वर्ष 10 से 12 हजार रुपये ही एक बीघा भूमि से लाभ हो पाता था। केले की पहली फसल से उन्हें 14 महीने में 75 से 80 हजार रुपये प्रति बीघा की आय हुई। इसमें उनकी 20 से 25 हजार प्रति बीघा लागत आई।
इस प्रकार केले की खेती कर उसकी पहली फसल से ही उन्हें लगभग एक वर्ष में 50 से 55 हजार रुपये प्रति बीघा का लाभ हुआ। हालांकि उन्होंने इसके लिए कृषि विभाग द्वारा दी जानकारी के अनुसार आधुनिक संसाधन और खेती करने तरीके अपनाए। लॉकडाउन के दौरान भी उनकी केले की फसल साहिबाबाद, दिल्ली और नोएडा के सब्जी व्यापारी उनके गांव में ही आकर नकद भुगतान करके ले गए।

