प्रदेश के सत्ता शिखर पर क्या योगी फिर होंगे विराजमान?

उत्तराखंडप्रदेश के सत्ता शिखर पर क्या योगी फिर होंगे विराजमान?

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प्रदेश के सत्ता शिखर पर क्या योगी फिर होंगे विराजमान?

अमित बिश्‍नोई

राजनीति में कहते हैं कि पहली बार पीएम या सीएम की कुर्सी तक पहुंचना काफी मुश्किल होता है मगर उससे मुश्किल होता है उस कुर्सी को संभालना और उसे बचाये रखना. लॉटरी में मिली सीएम की कुर्सी को योगी आदित्यनाथ अबतक कामयाबी से सँभालते आये हैं मगर इस कुर्सी को बचा पाएंगे यह एक बड़ा सवाल है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के अब कुछ ही महीने बाक़ी रह गए हैं, चुनाव की रणभेरी बज चुकी है. योगी सरकार के असली इम्तेहान की घड़ी नज़दीक आ चुकी है। अपने सिंहासन को बचाने के लिए योगी आदित्यनाथ रणभूमि में उतर चुके हैं. परिस्थितियां थोड़ी विपरीत हैं जिन्होंने योगी जी की राह में पत्थर बिछा दिए हैं, अब इन रास्ते के पत्थरों को हटाते हुए उन्हें फिर से अपना लक्ष्य प्राप्त करना है।

भाजपा का प्रदेश में लगातार दूसरी बार सत्ता में आना शायद उतना मुश्किल नहीं मगर योगी आदित्यनाथ का दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना उतना आसान भी नहीं क्योंकि सत्ता के शिखर पर पहुँचने को लालायित पार्टी के अंदर ही कई महत्वाकांक्षी नेता सक्रिय हैं. अभी दो महीने पहले ही नेतृत्व को लेकर भाजपा में एक बवण्डर उठा था जिसे बड़ी मुश्किल से शांत किया गया, मगर यह बवण्डर पूरी तरह से ख़त्म हो चूका है इस बारे में यक़ीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। रह रहकर यह बवंडर हिलोरें मारता रहता है, कभी प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्र देव का बयान तो कभी केशव प्रसाद मौर्या की टिप्पणियां यह एहसास दिलाती हैं कि अभी सबकुछ ठीक नहीं हुआ है।

किस करवट बैठेगा ब्राह्मण वोट बैंक का ऊँट?

एक तरह से कहा जा सकता कि योगी जी को दोबारा कुर्सी पाने के लिए तीन मोर्चों पर मुकाबला करना पड़ रहा है. किसान आंदोलन, कोरोना, बढ़ती मंहगाई और बेरोज़गारी से बने विपरीत हालात और पार्टी के अंदर से मिलते आघात और पहले की तुलना में मज़बूत विपक्ष। जिसमें से बढ़ती मंहगाई और बेरोज़गारी के मुद्दे से निपटने के लिए उनके पास आंकड़ों का हथियार है जिसे चलाकर अक्सर वह विपक्ष के हमले का जवाब देते रहते हैं. कोरोना महामारी से सबसे बेहतर ढंग से निपटने के लिए WHO का सर्टिफिकेट उनके पास है, मगर किसान आंदोलन योगी जी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है. हालाँकि अभी इसका असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित लग रहा मगर पिछले कुछ दिनों से किसानों के जो तेवर नज़र आ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि यह आग भड़ककर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी पहुँच सकती है, जिससे निपटना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर होगा।

क्या सोये हाथी को जगा पाएंगी मायावती?

हालाँकि किसानों की लड़ाई सीधे केंद्र की मोदी सरकार से है मगर गन्ने का विषय राज्य सरकार से जुड़ा हुआ है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसे हल करना होगा। चुनावी मौसम में यह बात किसानों भी मालूम है कि चुनाव से पहले गन्ने का बकाया भी मिलेगा और गन्ने के दाम भी बढ़ेंगे, विपक्ष भी यह जानता है कि चुनाव के करीब ही सीएम योगी इस बारे में एलान करके किसानों की नाराज़गी कम करने का दांव खेलेंगे। योगी जी को भी मालूम है कि भारत की, विशेषकर यूपी की जनता वर्तमान में जीती हैं और सपनों को बहुत पसंद करती है इसलिए इस तरह की घोषणा चुनाव के बिलकुल करीब ही की जानी चाहिए। अब अगर उन्होंने यह दांव खेला तो कामयाबी की कितनी गारंटी रहेगी इस पर गारंटी से कुछ नहीं कहा जा सकता।

इन सारी परिस्थियों के बावजूद योगी जी कानून और व्यवस्था पर यह सन्देश देने में ज़रूर कामयाब हैं कि प्रदेश में इस मुद्दे पर पहले से काफी बेहतरी हुई है, माफियाओं और बाहुबलियों के एनकाउंटर और उनकी सम्पत्तियों के ज़ब्तीकरण से योगी जी की एक सख़्त नेता की छवि बनी है और इस बात को लोग खुलेआम मानते भी हैं. ध्रूवीकरण के राजनीतिक माहौल में बहुसंख्यक समुदाय का एक बड़ा वर्ग इस बात से बहुत खुश है कि योगी जी की वजह से अल्पसंख्यक समुदाय में खौफ का माहौल है और सिर्फ योगी जी ही अल्पसंख्यकों की नकेल कस सकते हैं।

किसानों ने बढ़ाई जयंत चौधरी की बार्गेनिंग पावर

जहाँ तक फैन फॉलोविंग की बात है इस मामले में योगी जी का कद पीएम मोदी से कम नहीं। चुनाव प्रचार के दौरान पूरे देश में जितनी डिमांड सीएम योगी की होती है उतनी अपने मुख्यमंत्रित्व काल में नरेंद्र मोदी की कभी नहीं रही. योगी आदित्यनाथ एक चुनावी ब्रांड बन चुके हैं, अपनी फायर ब्रांड कार्यशैली से उन्होंने अपना एक वोट बैंक बना लिया है जो आँख मूंदकर उन्हें वोट करेगा। यह वह वोट बैंक है जिसे अपने नुक्सान की कोई चिंता नहीं उसे तो सामने वाला परेशान रहे इसी से ख़ुशी मिलती है।

बहरहाल योगी जी में क्षमताओं की कोई कमी नहीं यह उन्होंने साढ़े चार साल के अपने राज में दिखा दिया। विरोधियों से किस तरह निपटा जाता है उसे भी जता दिया। जनता की नब्ज़ पकड़ना भी उन्हें आता है, सबसे बढ़कर ध्रूवीकरण की राजनीति के वह मास्टर हैं। यह सारी बातें योगी जी के पक्ष में जाती हैं. हालाँकि प्रदेश में कांग्रेस के पतन के बाद किसी भी पार्टी की सरकार रिपीट नहीं हुई है मगर योगी आदित्यनाथ में ऐसा करने की क्षमता है. उन्हें अगर कोई खतरा है तो पार्टी के अंदर से है. घर के बाहर की लड़ाई मुश्किल नहीं होती क्योंकि सामने दुश्मन कौन है यह पता होता है लेकिन घर के अंदर की लड़ाई बड़े से बड़े योद्धा को भी धराशायी कर देती है. अब देखना है कि योगी जी बाहरी और अंदुरुनी दुश्मनों से कैसे निपटे हैं। क्या भाजपा की दोबारा सरकार बनाकर वह एकबार फिर सीएम की कुर्सी पर विराजमान होंगे। इंतज़ार कीजिये और देखते रहिये आगे आगे होता है क्या।

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