किस करवट बैठेगा ब्राह्मण वोट बैंक का ऊँट?

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किस करवट बैठेगा ब्राह्मण वोट बैंक का ऊँट?

अमित बिश्‍नोई

ब्राह्मण शब्द की वैसे तो बड़ी लम्बी व्याख्या है लेकिन अगर हम मोटे तौर पर ब्राह्मण के अर्थ जानने की बात करें तो अपर कास्ट के अलावा किसी ज्ञानी, किसी समझदार, किसी रणनीतिकार और नेतृत्व क्षमता वाले किसी व्यक्ति की छवि सामने आती है. शायद यही वजह कि आदिकाल से हम समाज के हर क्षेत्र में ब्राह्मण समुदाय को महत्वपूर्ण स्थान देते आये हैं. यहाँ हम बात यूपी की राजनीति की करेंगे और 6 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण समुदाय के बढ़ते महत्त्व या कह सकते हैं कि एक वोट बैंक के रूप में बढ़ती डिमांड पर बात करेंगे।

यूपी की राजनीति की अगर हम बात करें तो हम पाएंगे कि काफी लम्बे अरसे तक प्रदेश की सत्ता में ब्राह्मणों का बोलबाला रहा है. मण्डल और कमण्डल की राजनीति से पहले एक दो नहीं बल्कि इस समुदाय से 6 लोग प्रदेश की सत्ता सिंहासन पर विराजमान हुए हैं. प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत इसी समुदाय से थे. इन्होने 46 से लेकर 54 तक प्रदेश की बागडोर संभाली। इसके बाद सुचेता कृपलानी ने 63 से 67 तक, पंडित कमलापति त्रिपाठी ने 71 से 73 तक, हेमवतीनंदन बहुगुणा ने दो बार 73 से 74 और 74 से 75 तक, श्रीपति मिश्र 82 से 84 और नारायणदत्त तिवारी जो चार बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और प्रदेश अंतिम ब्राह्मण मुख्यमंत्री भी. कुल मिलाकर प्रदेश में 9 बार ब्राह्मण समुदाय के किसी व्यक्ति ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद को सुशोभित किया। यहाँ यह बता दूँ कि यह सभी कांग्रेस पार्टी से थे.

अस्सी के दशक के बाद यूपी में कांग्रेस पार्टी का पराभव शुरू हो गया और ब्राह्मण समुदाय सत्ता सिंहासन से दूर होता चला गया क्योंकि 89 के बाद प्रदेश में जितनी भी पार्टियां सत्ता में आईं, चाहे वह भाजपा हो, बसपा हो या सपा, किसी ने भी ब्राह्मण समुदाय के व्यक्ति को प्रदेश का नेतृत्व करने का मौका नहीं दिया।
सपा और बसपा से तो कोई उम्मीद ही नहीं थी मगर भाजपा ने भी किसी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री पद के काबिल नहीं समझा, बावजूद इसके कि कांग्रेस के बाद भाजपा ब्राह्मणों की पहली पसंद बनी और यूपी में भाजपा को पहचान दिलाने में, सत्ता तक पहुँचाने में अग्रणी भूमिका निभायी मगर बात जब नेतृत्व की आयी तो भाजपा ने इस समुदाय को अबतक ठेंगा दिखाती आयी है क्योंकि प्रदेश की जातीय संरचना और राजनीति के गुणा भाग में ब्राह्मणों को सत्ता सौंपना भाजपा को फायदेमंद नहीं लगता।

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अगर हम पिछले तीन दशकों की यूपी की सियासत को देखें तो पाएंगे कि ब्राह्मण समुदाय भी अब सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है. कभी डिमांड में तो कभी डिमांड के बाहर। वैसे अगर देखा जाय तो राजनीतिक हाशिये पर पहुँच चुके ब्राह्मण समुदाय को दोबारा पहचान दिलाने में बहुजन समाज पार्टी का बड़ा हाथ है, बिखरे पड़े इस समुदाय को वोट बैंक के रूप में मायावती ने बखूबी समझा और उसे एकजुट कर 2007 में सत्ता तक पहुँचने के लिए इस समुदाय का बेहतर इस्तेमाल किया। तिलक, तराज़ू और तलवार से नफरत करने वाली मायावती ने अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले में ब्राह्मणों को बड़ी खूबसूरती से फिट किया। बसपा से 41 ब्राह्मण विधायकों का जीतना इस फॉर्मूले के हिट होने का जीता जागता सबूत है.

2017 में मायावती के इसी सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को भाजपा के चाणक्य अमित शाह ने और बेहतर तरीके से यूपी की जनता के सामने पेश किया और प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। भाजपा ने 312 सीटें जीतीं जिनमें 58 विधायक ब्राह्मण समुदाय से थे, डॉक्टर दिनेश शर्मा मुख्यमंत्री पद के सबसे योग्य उम्मीदवारों में थे मगर लॉटरी योगी जी की खुल गयी. ब्राह्मण भाजपा में एकबार फिर ठगा सा रह गया.

अब एकबार फिर ब्रह्माण्ड समुदाय डिमांड में है. सभी पार्टियों ने ब्राह्मणों पर डोरे डालना शुरू कर दिए हैं. बसपा ने ब्राह्मण सम्मेलनों की शुरूआत कर दी है, अखिलेश ने भी ब्राह्मण नेताओं से मुलाक़ात का सिलसिला शुरू कर दिया है, कांग्रेस का तो ब्राह्मणों से हमेशा लगाव रहा है और ब्राह्मण को सबसे ज़्यादा सम्मान कांग्रेस में ही मिला है. 2017 में ब्राह्मणों का अस्सी प्रतिशत वोट लेने वाली भाजपा भी इस बार ब्राह्मण ब्राह्मण जप रही है. वैसे तो योगीराज में ब्राह्मण समुदाय की अनदेखी का आरोप लगातार लगता रहा है, बहुत से मौकों पर ब्राह्मण समाज के नेताओं की नाराज़गी भी खुलकर सामने आयी है. अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या वाक़ई में ब्राह्मण भाजपा से नाराज़ हैं, क्या यह नाराज़गी वोट के ज़रिये उतरेगी। उससे बड़ा सवाल यह है कि यह नाराज़ ब्राह्मण वोटर भाजपा का त्यागकर किसे अपनाएगा, क्या अपनी पैरेंट पार्टी कांग्रेस की ओर रुख करेगा जहाँ से उसे बहुत कुछ मिला है या फिर सपा में भविष्य तलाशेगा या बसपा के ब्राह्मण सम्मलेन से प्रभावित होकर एकबार फिर वह हाथी की सवारी करेगा।

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बहरहाल अभी चुनाव में काफी समय है, देखते हैं ब्राह्मण वोट बैंक का ऊँट किस करवट बैठेगा। लेकिन इस चुनाव में ब्राह्मण डिमांड में है और चुनाव तक रहेगा , इसमें कोई शक नहीं।

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