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मर्यादा के चीरहरण पर क्यों चुप है चुनाव आयोग ?

आर्टिकल/इंटरव्यूमर्यादा के चीरहरण पर क्यों चुप है चुनाव आयोग ?

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पारुल सिंहल
पांच पांडव कौरवों के साथ द्यूतक्रीड़ा में द्रौपदी को हार गए। राजसभा में धृतराष्ट्र समेत कई दिग्गज मौजूद थे। दुर्योधन ने द्रौपदी को उनके केशों को पकड़कर घसीटते हुए सभा में लाने का आदेश दिया। द्रौपदी आईं। दुर्योधन ने फिर पूरी सभा के सामने द्रौपदी का चीर हरण करने का आदेश दिया। सभा में सब मौन बैठे रहे। सत्ता के लालच में मान मर्यादा तक पर रखी जा चुकी थी। यह बात द्वापर युग की है, किंतु कलयुग में भी सत्ता के लालच में राजनेता सारी मान मर्यादाएं भूल बैठे हैं। चुनाव आयोग के नियमों की राजनैतिक दल खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। द्वापर युग की तरह सत्ता पक्ष लोक सभा चुनावों में जमकर चीर हरण कर रहा है लेकिन आयोग चुप है। इस चुप्पी की वजह किसी को समझ नहीं आ रही लेकिन, लोकतंत्र तार – तार हो चुका है। चुनावों के भाषण हो, चुनावी सभा हो चुनाव आयोग की मर्यादा पूरी तरह छलनी हो चुकी है। आयोग पर आरोप है कि सत्ता पक्ष द्वारा दिए जा रहे मुस्लिम विरोधी बयानों पर आयोग ने चुप्पी साध रखी है वहीं शिकायतों पर भी पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाया हुआ है। चुनाव आयोग की चुप्पी को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं। वहीं माना जा रहा है कि आयोग किसी राजनैतिक दल के दबाव में तो कार्य नहीं कर रहा है। यदि ऐसा हुआ तो लोकतंत्र को बड़ा झटका लग सकता है।

आंकड़े देने में देरी पर उठ रहे सवाल

देश में पहले और दूसरे चरण के आम लोकसभा चुनाव के आंकड़े जारी करने में चुनाव आयोग ने इस बार तय समय से अधिक समय लगाया। जिसे लेकर विपक्ष ने चुनाव आयोग पर जमकर निशाना साधा। साथ ही इस पर सवालिया निशान भी खड़े किए। विपक्ष का कहना है कि मतदान होने के 24 घंटे के बाद तक भी आंकड़े ना देना अस्वीकार्य है। इसके साथ ही कई सिविल सोसाइटीज ने भी चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। 11 अप्रैल और 26 अप्रैल को हुए मतदान के आंकड़े देने में असामान्य देरी हुई। मतदान प्रतिशत भी कई फ़ीसदी बढ़ाकर दिया गया। जिसने चुनाव आयोग की पारदर्शिता को कटघरे में ला खड़ा किया। वहीं चुनाव आयोग के व्यवहार पर भी संदेह की स्थिति उत्पन्न हो गई।

हेट स्पीच पर नहीं कोई एक्शन

लोक सभा चुनावों में इस बार विकास के मुद्दों की बजाय हिंदू मुस्लिम जैसे मुद्दों को तूल दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री समेत कई बड़े केंद्रीय मंत्री अपने भाषणों में विपक्ष और इंडी गठबंधन पर मुस्लिम समाज को बढ़ावा देने का आरोप लगा चुके हैं। जबकि चुनाव में धर्म, जाति, धार्मिक चुनाव चिन्ह आदि का प्रयोग गैर कानूनी है। भाजपा द्वारा रील के राम को चुनाव में उतारने, चुनाव प्रचार की राम मय बनाने और लगातार राम मंदिर को मुद्दा बनाकर वोट मांगे जा रहे हैं। पीएम मोदी का बांसवाड़ा में मुसलमानों पर टिप्पणी का बयान बीते दिनों का काफी चर्चित रहा था। जिस पर चुनाव आयोग ने मूक दर्शक बनने वाला रुख अपना लिया है।

शिकायतों पर नहीं संज्ञान

चुनाव आयोग के नियमों का उल्लंघन करने को लेकर कई शिकायतें मुख्य निर्वाचन आयोग में पहुंची। राजस्थान कांग्रेस ने ही 21 शिकायतें दर्ज करवाईं लेकिन एक पर नोटिस नहीं दिए जाने पर आयोग की भूमिका पर पक्षपात पूर्ण रवैए अपनाए जाने के आरोप लग रहे हैं। इसके साथ ही प्रधानमंत्री के बयानों पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा को नोटिस दिए जाने पर भी सवाल खड़े हुए हैं। आयोग की भूमिका पर संदेह किया जा रहा है।

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