- जिम्बाब्वे और वेनेजुएला जैसे देशों में महंगाई पहुंच गई थी चरम पर
- कैश की बढ़ती किल्लत को देखकर लोगों के जेहन में सवाल क्यों नहीं छाप रहे नोट
अमित बिश्नोई
नोट बंदी के बाद से देश में कैश की किल्लत बढ़ी है. ऐसे में लोगों के जेहन में यह सवाल है कि जब इतनी दिक्कत हो रही है तो सरकार नए नोट क्यों नहीं छापती. कोरोना काल में कैश क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा. नए नोट आ जाएंगे तो बाजार से कैश की किल्लत खत्म हो जाएगी. यदि आपके मन में ऐसे ही सवालों की उधेड़बुन चल रही है तो हम आपको बताते हैं कि ऐसा करने से क्या होगा और देश की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा. आइए पहले जान लेते हैं कि अभी देश में लिक्विडिटी यानी कैश की पोजीशन क्या है. आरबीआई ने जो 2021 मार्च में आंकड़े दिए थे उसके मुताबिक देश में 28.60 लाख करोड़ के नोट चलन में हैं. यह जनवरी 2020 में 21.79 लाख करोड़ थे. इससे यह पता लगता है कि एक साल के अंदर ही करीब सात लाख करोड़ से ज्यादा कैश मार्केट में आ गया. वहीं अगर नोटबंदी 8 नवंबर 2016 में जब हुई थी. तब उस वक्त देश के पास 18 लाख करोड़ रुपए की नकदी थी. इनमें से 15.28 लाख करोड़ रुपए पांच सौ और एक हजार के नोट थे. ब्लैक मनी देश से निकालने के नाम पर यह नोट बंद कर दिए गए थे. अब आपको बताते हैं कि यदि नोट और छापे गए तो क्या होगा.
3 साल तक की लगती एडवांस प्लानिंग
नोट छापने के लिए 3 साल तक की एडवांस प्लानिंग लगती है. इसमें यह देखा जाता है कि अगले तीन साल की क्या स्थिति होगी उसी हिसाब से नोटों की प्रिंटिंग का प्लान तैयार होता है. साथ ही आपको बता दें कि यदि किसी देश में एक बार हार्पर इंफ्लेशन मोड में इकोनॉमी पहुंच जाए तो वहां से उभर पाना बहुत मुश्किल साबित होता है.
बढ़ा खतरा महंगाई का
नोटों को छापने में जो सबसे बड़ा खतरा सामने आता है वो है महंगाई. आप जिम्बाब्वे और वेनेजुएला का उदाहरण देख सकते हैं. यहां नोट छापने के बाद से ही महंगाई चरम पर पहुंच गई. महंगाई बढ़ने से देश के सभी लोगों को परचेजिंग पावर कम हो जाती है. इसे ऐसे समझे की जो चीज आपको 100 रुपए की पांच मिलती है वह आपको महंगाई बढ़ने के बाद चार मिलने लगे तो आपने 1 चीज के दाम महंगाई के रूप में चुका दिए. साथ ही डायरेक्ट मॉनिटाइजेशन हमारी पॉलिसी क्रेडिबिलिटी को नुकसान पहुंचाता है.

