जिन संबंधियों का देहावसान हो गया है। जिनको दूसरा शरीर नहीं मिला है वे पितृलोक में अथवा इधर-उधर विचरण करते हैं। उनके लिए पिण्डदान किया जाता है। बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता। आज से पित्रपक्ष यानी श्राद्ध शुरू हो चुकेे है। इस बार पूरे 16 दिन के श्राद्ध हैं। जानिए किस प्रकार श्राद्ध कर्म करना चाहिए और कैसे इसको करने का विधान है। विचारशील पुरुष को चाहिए कि जिस दिन श्राद्ध हो उससे एक दिन पूर्व ही संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निमंत्रण दें। परंतु श्राद्ध के दिन कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारें तो उन्हें भोजन कराना चाहिए।
भोजन के लिए अन्न अत्यंत मधुर, भोजनकर्ता की इच्छा के अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ हो। पात्रों में भोजन रखकर श्राद्धकर्ता को अत्यंत सुंदर एवं मधुर वाणी से खिलाना चाहिए। श्रद्धायुक्त व्यक्तियों द्वारा नाम और गोत्र का उच्चारण करके दिया अन्न पितृगण को वे जैसे आहार के योग्य होते हैं वैसा होकर मिलता है। श्राद्धकाल में द्रव्य, शरीर, भूमि,स्त्री, मंत्र, मन और ब्राह्मण-ये सात चीजें विशेष शुद्ध होनी चाहिए। श्राद्ध में तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए। अक्रोध, शुद्धि और अत्वरा यानी जल्दबाजी नही करना।
श्राद्ध में मंत्र का महत्त्व है। श्राद्ध में आपके द्वारा दी वस्तु कितनी मूल्यवान क्यों न हो, लेकिन आपके द्वारा मंत्र का उच्चारण ठीक न हो तो काम ठीक नहीं हो पाता है। मंत्रोच्चारण शुद्ध होना चाहिए। जिसके निमित्त श्राद्ध करते हों उसके नाम का उच्चारण शुद्ध करना चाहिए। जिनकी देहावसना-तिथि पता नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए। हिन्दुओं में पत्नी जब संसार से जाती है तो पति को हाथ जोड़कर कहती है। मुझसे कुछ अपराध हुआ हो तो क्षमा करना। मेरी सदगति के लिए प्रार्थना करना। अगर पति जाता है तो हाथ जोड़कर पत्नी से कहता है। जाने-अनजाने में तेरे साथ कभी कठोर व्यवहार किया तो मुझे क्षमा कर देना और मेरी सदगति के लिए प्रार्थना करना। हम एक दूसरे की सदगति के लिए जीते जी सोचते हैं। मरते समय सोचते हैं और मरने के बाद सोचते हैं।
श्राद्ध सम्बन्धी बातें –
श्राद्ध करते समय जो श्राद्ध भोजन कराया जाता है, तो 11ः36 से 12ः24 तक उत्तम काल होता है। गया, पुष्कर, प्रयाग और हरिद्वार में श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना है। गौशाला में, देवालय में नदी तट पर श्राद्ध करना श्रेष्ठ चांदी,सोना, तांबा और कांसे बर्तन में अथवा पलाश के पत्तल में भोजन करना-कराना अति उत्तम है। श्राद्ध के समय अक्रोध रहना, जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। बड़े लोगों को या बहुत लोगों को श्राद्ध में सम्मिलित नहीं करना चाहिए। सफ़ेद सुगन्धित पुष्प श्राद्ध कर्म में काम में लाने चाहिए। लाल, काले फूलों का त्याग करें।

