- माओ के अनुसार इसमें तिब्बत वो दाहिनी हथेली थी, जो चीन का हिस्सा होनी चाहिए थी
- दाहिनी हथेली से जुड़ी अगुलियां मानी गईं- सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, भूटान, नेपाल और लद्दाख.
चीन की उस रणनीति को जानिए जिसे वो लंबे समय से फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत स्ट्रैटजी कहता आया है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, माओ के अनुसार इसमें तिब्बत वो दाहिनी हथेली थी, जो चीन का हिस्सा होनी चाहिए थी. साथ ही दाहिनी हथेली से जुड़ी अगुलियां मानी गईं- सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, भूटान, नेपाल और लद्दाख.
चुप्पी अब भारी पड़ रही है
1959 में चीन ने अपनी सेनाएं भेजकर दाहिनी हथेली यानी तिब्बत पर कब्जा कर लिया. तब दुनिया ने किसी भी देश ने या इंटरनेशनल बिरादरी ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई. किसी ने उसका विरोध नहीं किया. भारत ने विरोध जरूर किया लेकिन बहुत कमजोर तरीके से. यहां तक एक शांतिप्रिय राष्ट्र तिब्बत पर जबरदस्ती कब्जे का मामला संयुक्त राष्ट्र में भी नहीं उठा.अगर तभी चीन को तिब्बत पर कब्जा करने से रोका जाता तो वो यहां तक बढ़ ही नहीं पाता और एक बड़े भू-भाग पर अपना दावा नहीं जता पाता. तब भारत ने केवल इतना जरूर किया कि उसने तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु और शासक दलाई लामा को देश में शरण दी. वो बडे़ पैमाने पर अपने समर्थकों के साथ भारत पहुंचे थे. इतने सालों बाद भी तिब्बती यहां पर शरणार्थी बने हुए हैं.
पहली अंगुली यानि सिक्किम
अब पांच अंगुलियों की बात करते हैं. पांच अंगुलियों में सिक्किम का भारत में 1975 में विलय हो गया. हालांकि तब चीन ने इस पर खासा विरोध जाहिर किया था. लेकिन उसकी चल नहीं पाई. तब से सिक्किम भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है. लेकिन इससे जुड़ी सीमा पर चीन की फौजें हमेशा घुसपैठ की कोशिश करती हैं या जमावड़ा बनाए रखती हैं.
दूसरी अंगुली अरुणाचल प्रदेश
दूसरी अंगुली है अरुणाचल प्रदेश. वर्ष 1962 में जब भारत-चीन का युद्ध हुआ तो चीन की फौजें इस इलाके में काफी अंदर तक घुस आईं थीं. अब अरुणाचल के एक बड़े भाग पर चीन का कब्जा है. इस इलाके को नेफा भी कहा जाता है. चीन इसे अपना मानता है. उसका दावा है कि ऐतिहासिक तौ पर ये उसका इलाका है. हालांकि इसके कोई प्रमाण नहीं हैं.हद तो ये है कि अरुणाचल प्रदेश पर चीन रह-रहकर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करता है. जब भी वहां कोई भारतीय नेता जाता है, तब वो उस आधिकारिक तौर पर विरोध जाहिर करता है. अरुणाचल के लोगों के पास भारतीय पासपोर्ट हैं लेकिन चीन इसे भी नहीं मानता. अक्सर वो अरुणाचल प्रदेश से चीन जाने वाले लोगों को वीजा नहीं देता. अरुणाचल के पास भी सामरिक महत्व की जगहों पर चीनी सेनाएं डटी रहती हैं.
तीसरी अंगुली है नेपाल, जो अब चीन की गोदी में बैठ चुका है
तीसरी अंगुली है नेपाल. एक जमाने में नेपाल ये दावा करता रहता था कि चीन उसका सबसे बड़ा दुश्मन देश है, क्योंकि जिस तरह उसने तिब्बत पर कब्जा किया है, उससे वो बहुत आहत है. हालांकि नेपाल के एक बडे़ इलाके पर हमेशा से चीन ने दावा जताया है. तब चीन के डर से बचने के लिए नेपाल ने भारत को सैन्य मदद तक करने की गुहार लगाई थी.भारत पिछले 70 सालों से नेपाल को लगातार हर तरह की मदद भी करता रहा था लेकिन अब नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार चीन की गोदी में बैठकर भारत को अपना दुश्मन बताने लगी है. हालांकि नेपाल को ये अंदाज नहीं है कि चीन जिस फाइव फिंगर की रणनीति पर गंभीरता से कदम बढ़ाता रहा है, उसमें अब सबसे बड़ा खतरा उस पर ही मंडरा रहा है.
चौथी अंगुली भूटान को फुसलाने की भरपूर कोशिश
चौथी अंगुली भूटान है. भारत के पूर्वी छोर पर बसा भूटान शांतिप्रिय और सुंदर देश है. चीन लंबे समय से उस पर अपना दावा जताता रहा है. ये उसकी फाइव फिंगर्स स्ट्रैटजी में आता है यानि उसे भूटान पर एक ना एक दिन कब्जा करना ही है.भूटान और भारत के बीच सैन्य संधि है. भारत इस संधि के तहत पूरी तरह भूटान को सैन्य मदद करता है. भारतीय सेनाएं उसकी सुरक्षा का काम करती हैं. हालांकि लंबे अर्से से चीन इस छोटे से देश के सामने आकर्षक विदेशी निवेश और मदद का चारा फेंकता रहा है लेकिन भूटान ने कभी उसको स्वीकार नहीं किया है.
पांचवीं अंगुली लद्दाख, जहां हमेशा होती है घुसपैठ
पांचवीं अंगुली लद्दाख है, जिस पर चीन की नजर सबसे ज्यादा रहती है. यहां वो पिछले कुछ सालों में लगातार घुसपैठ करता रहा है. हमारे बहुत से इलाकों पर उसने कब्जा भी कर लिया है. एक जमाने में समूचा अक्साई चिन भारत में था, जिसे चीन हथिया चुका है. अब वो उस गलवान घाटी पर आगे आकर सेनाएं लेकर बैठा हुआ है, जिस पर आज तक उसका कब्जा नहीं था. अब उसने खुले तौर पर गलवान घाटी पर दावा जता दिया है.लिहाजा आप समझ गए होंगे कि चीन की ये खतरनाक रणनीति क्या है. जिसके लिए चीन हमेशा से कदम बढ़ाता रहा है. भारत को इस समझते हुए अपने इन संवेदनशील क्षेत्रों की पुख्ता सुरक्षा की जरूरत है.

