रंजीता सिन्हा
लखनऊ। यूपी मिशन 2022 से पहले चुनावी तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी जहाँ बसपा के बिखराव को समेटने की कोशिश में हैं तो वहीँ भाजपा खुद को बिखरने से बचाने की कोशिश में लगी है. असल में, पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने यूपी में सत्ताधारी पार्टी पर फिदा उन वोटरों को एक संदेश तो दे ही दिया कि नेतृत्व अब लिब्रल और सेकुलर चाहिये। इस नजरिये से देखा जाय तो उत्तर प्रदेश में परिवर्तन की आहट साफ़ सुनी जा सकती है। और परिवर्तन हुआ तो अन्य दलों के मुकाबले समाजवादी पार्टी को सत्ता की परोसी हुई थाली जनता अगर थमा दे तो आश्चर्य न होगा।
अखिलेश यादव की बात करें तो पार्टी को पूरी तरह अपने नेतृत्व में लेने के बाद सपा मुखिया ने पहले, साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से और बाद में 2014 के आम चुनाव में बसपा से मिलकर किस्मत आजमायी। दोनों ही राजनीतिक प्रयोग में अखिलेश असफल रहे। हालांकि, इस बार भी संकेत उनके एक तीसरा प्रयोग करने के मिल रहे हैं। इस प्रयोग में अखिलेश राष्ट्रीय लोकदल के नवनिर्वाचित अध्यक्ष जयन्त चौधरी से हाथ मिला सकते हैं। हालांकि राजनीति के जानकार इस प्रयोग के सफल हो जाने की भविष्यवाणी अभी से करते नजर आ रहे है। इसके पीछे दोनों को उन किसानों का समर्थन मिलना बताया जा रहा है जो फिलहाल केन्द्र की मोदी सरकार के खिलाफ किसान बिल को लेकर आंदोलित हैं।
वैसे सच पूछा जाय तो साल 2012 में समाजवादी पार्टी जब बहुमत में आयी थी तो उसके पीछे अखिलेश यादव की रथयात्रा और इस रथयात्रा के लिए की गई उनकी अथक मेहनत काबिल-ए-तारीफ थी। रैलियों में अखिलेश के चेहरे से बहते पसीने ने जीत की कहानी पहले ही सुना दी थी।
बहरहाल, मौजूदा वक्त में जिस तरह यूपी भाजपा की सरकार और संगठन में बेचैनी है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक को बदलने की चर्चाएं तेज है, उससे अखिलेश खेमा अवश्य राहत की सांस ले रहा होगा। हालांकि भाजपा प्रदेश प्रभारी कहते हैं कि कोई फेरबदल नहीं होने वाला पर स्थितियां कुछ दिनों के भीतर एक के बाद एक हल्के-फुल्के भूकंप सरीखी है यानि यूपी सियासत को लेकर तेज भूकंप कभी भी आ सकता है। ऐसे में भाजपा की अलोकप्रियता बढऩे और पंचायत चुनाव में भाजपा की बी टीम बनने के बाद अब जिलों की राजनीति में सपा का अंडरकरेंट महसूस किया जा रहा है। भाजपा की ओर से दावा किया जा रहा है कि हर जिले में भाजपा के बागी बड़ी तादाद में जीते हैं और पार्टी उन्हें वापस लाकर जिला पंचायत की कुर्सी भी हासिल कर लेगी, लेकिन सपा खेमा इस दावे को मानने के लिए तैयार नहीं है।
इसमें दो राय नहीं कि, कोरोना में सरकारी अव्यवस्थाओं के कारण लोग भाजपा से निराश हैं। यही कारण है कि भविष्य के पारखी दूसरे राजनीतिक दलों के बड़े नेता खुलकर सपा के साथ आ रहे हैं। आने वाले कुछ दिनों में सामने भी आ जाएगा कि, किस तरह दूसरे दलों के बड़े नेता अपनी पार्टी छोड़कर सपा के साथ आ रहे हैें। सपा के एक नेता का दावा है कि, जून महीने का पहला सप्ताह बीतने के बाद हर जिले से नेताओं की फ ौज टूटकर आने को है। इसके साथ ही प्रदेश की जिला पंचायत में अध्यक्ष बनने वालों की तस्वीर भी सामने आ जाएगी।
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भाजपा में उहापोह के हालात, कन्फ्यूज्ड कांग्रेस और बसपा में भगदड़ की तस्वीरों के बीच अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित रखने के लिए जिलों में सभी प्रमुख दावेदार सपा के साथ आने के लिए तैयार हैं। समाजवादी पार्टी पहले जिला पंचायत अध्यक्ष मिशन पर जुटेगी और फिर करेगी मिशन 2022 को फतेह करने का महज इंतजार।

