देहरादून। उत्तराखंड चुनाव 2022 – महिलाओं की उत्थान और उनको बराबरी का दर्जा देने की बात करने वाले राजनैतिक दल टिकट बंटवारे के दौरान अपनी इन बातों को भूल जाते हैं। टिकट वितरण के दौरान महिलाओं की दावेदारी एक तरफ रख दी जाती है और तवज्जों पुरुषों की दावेदारी को दी जाती है। इस बार उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है। राजधानी देहरादून हो या फिर और कोई जिला। यहां पर सभी प्रमुख दलों ने उम्मीदवार चयन और टिकट वितरण में महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को महत्व दिया है। इससे महिला दावेदारों में आक्रोश है। लेकिन पार्टी की नीतियों से बंधी होने के कारण वे चाहकर भी मुंह नहीं खोल पा रही है।
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टिकट वितरण में कंजूसी करने में भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल सबसे आगे हैं। ये दोनों वो राजनैतिक पार्टियां हैं। जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर कई महिलाएं बड़े ओहदे पर हैं। केंद्र में तो भाजपा की सरकार है जिसमें कई महिलाएं केंद्रीय मंत्रीमंडल में भी शामिल हैं। वित्तमंत्री हो या फिर स्मृति ईरानी दोनों ही अपनी जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभा रही हैं। लेकिन राज्यों में महिलाओं के नेतृत्व और महिलाओं की चुनाव में दावेदारी को सियासी दल नकारते रहे हैं। उत्तराखंड में भी कुछ ऐसे ही हैं। इस बार यहां पर भी महिलाओं को टिकट नहीं दिया गया है। राजधानी देहरादून में प्रमुख दलों ने एक—एक महिला को उम्मीदवार बनाया है। बता दे कि यह कोई पहला अवसर नहीं हैं जब महिलाओं की दावेदारी को नकारा गया हो। इससे पहले भी चुनाव में महिलाओं को दरकिनार किया गया है।
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यहीं कारण है कि राज्य बनने के बाद से आज तक जितने भी चुनाव हुए उनमें कोई भी महिला विधानसभा की दहलीज नहीं लांघ पाई। राजधानी देहरादून के रायपुर, कैंट, राजपुर, मसूरी आदि विधानसभा सीटों से महिलाओं ने दावेदारी की थी। लेकिन किसी को टिकट नहीं दिया गया। एकमात्र कैंट सीट पर भाजपा ने अपने दिवंगत विधायक हरबंस कपूर की धर्मपत्नी सविता को टिकट दिया है। जबकि अन्य पर पुरुष प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। कुछ ऐसा ही कांग्रेस ने किया है। कांग्रेस भी भाजपा के नक्शे कदम पर चली और उसने भी महिलाओं पर भरोसा नहीं जताया।

