लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने लोकसभा में एक बार फिर अपना नेता बदल दिया है। अंबेडकरनगर लोकसभा से सांसद रितेश पांडे की जगह पर बसपा ने बिजनौर (Bijnor) की नगीना से सांसद गिरीश चंद्र जाटव को जिम्मेदारी दी गई है। यानी की लोकसभा में बसपा की ओर से वो सदन के नेता रहेंगे। गिरीश चंद्र जाटव अब तक बसपा चीफ व्हीप थे, अब उनकी जगह का आजमगढ़ के लालगंज लोकसभा से सांसद संगीता आजाद को जिम्मेदारी दी गई है। जबकि श्रावस्ती के राम शिरोमणि वर्मा उपनेता बने रहेंगे।
इनको मिली है जिम्मेदारी
गिरीश चंद्र जाटव मायावती (Mayawati) के बेहद करीबी माने जाते हैं। इसके पहले भी वह पार्टी में कई बड़ी जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। 2014 में भी वह नगीना से चुनाव लड़े थे लेकिन तब बीजेपी के यशवंत सिंह ने उन्हें हरा दिया था। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के दौरान नगीना सीट बसपा के खाते में आई थी। मायावती ने इस बार भी गिरीश चंद्र जाटव (Girish Chandra Jatav) पर भरोसा जताया। जिसके बाद उन्होंने सीटिंग एमपी यशवंत सिंह को एक लाख 66 हजार 832 मतों से मात दी थी। गिरीश चंद्र जाटव इसके पहले 1991 में सहकारी समिति के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। 1993 में सभापति बने और 1995 में मुरादाबाद नगर निगम में पार्षद भी रहे, इसके अलावा वाइस चेयरमैन एक्जीक्यूटिव कमेटी भी रह चुके हैं। उनके कद को देखते हुए मायावती ने साल 2000 में मुराबाद जिले का उनको जिलाध्यक्ष नामित किया और 2006 में मंडल अध्यक्ष बनाया। 2007 में बसपा की लहर के दौरान चंदौसी से विधायक बने और 2012 में हार का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा सांसद बनने के बाद गिरीश चंद्र जाटव अनुसूचित जातियों व जनजातियों के कल्याण संबंधी समिति के सदस्य बने। इसके अलावा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संबंधी स्थायी समिति के भी सदस्य बनाये गय हैं। इसके साथ ही वह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य रहे।
रणनीति फेल
मायावती ने 2022 के विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2022) में दलित-ब्राह्मण और मुस्लिम गठजोड़ की सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को एक बार फिर 2007 की तरह दोहराने की कोशिश की थी, लेकिन जनता ने इसे बुरी तरह नकार दिया। यही कारण रहा कि मायावती ने लोकसभा में रितेश पांडे को सदन का नेता बनाया था। लेकिन, उनके पिता और पूर्व सांसद राकेश पांडेय चुनाव के ठीक पहले सपा (SP) में शामिल हो गये और विधायक भी बने हैं। विधानसभा चुनाव में बसपा के वोटबैंक में रिकॉर्ड गिरावट देखने को मिली है। स्थिति यह रही कि अब दलित वोटबैंक भी खिसकने लगा है। ऐसे में रितेश पांडे को हटाने के निर्णय को डैमेज कंट्रोल की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। रितेश पांडे जैसे नेता ब्राह्मण वोट बैंक को बसपा से जोड़ना तो दूर अपने परिवार के सदस्यों को विरोधी पार्टियों में जाने से नहीं रोक पाये हैं।
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नाराजगी को कैसे करेंगी दूर
दलितों की पार्टी माने जाने वाली बसपा में सतीश मिश्र के दखल के बाद एक के बाद एक दलित और पिछड़े समाज के नेता या तो पार्टी छोड़ गये या उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 2022 में मिली करार हार के बाद समर्थकों में एक बड़ी नाराजगी फैल गई है। खासकर उन नेताओं के खिलाफ जो पार्टी में बड़े ओहदे पर थे लेकिन अपने समाज के लोगों को जोड़ नहीं पाये। रितेश पांडे का जिला अंबेडकरनगर बसपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। 2017 में भाजपा की लहर के बीच बसपा छह में से चार सीटें जीतने में कामयाब रही थी। लेकिन, इस बार सपा ने सूपड़ा साफ कर दिया। आलम यह था कि बसपा यहां पर तीसरे नंबर पर रही थी। इसको लेकर मायावती काफी नाराज बताई जा रहीं हैं। यही कारण है कि उनका पहला चाबुक रितेश पांडे (Ritesh Pandey) पर चला है। बसपा के दलित कार्यकर्ता भी लगातार उपेक्षा की शिकायतें कर रहे थे। सूत्रों का दावा है कि ऐसी कई कार्रवाईयां अभी और भी की जा सकतीं हैं।

