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एक और घमासान के लिए यूपी तैयार

आर्टिकल/इंटरव्यूएक और घमासान के लिए यूपी तैयार

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अमित बिश्नोई
दो महीनों तक चलने वाला लोकसभा चुनाव का रण अब समाप्त हो चूका है. सरकार बनाने में प्रधानमंत्री मोदी एकबार फिर कामयाब हो गए हैं लेकिन उनके चेहरे पर वो रंगत नहीं है जो 2014 और 2019 के चुनाव के बाद थी. सरकार बनाने के लिए NDA गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल था लेकिन ये संख्या बल उस वक्त बड़ा छोटा नज़र आता है जब सामने 400 और 370 का लक्ष्य प्राप्त करने का दावा खड़ा नज़र आता है. भाजपा और मोदी जी के लिए ये चुनाव किसी झटके से कम नहीं, भाजपा को न सिर्फ अपने दम पर बहुमत मिल सका बल्कि उत्तर प्रदेश में औंधे मुंह गिरना उसके लिए एक ऐसा सपना बना जो उसके भविष्य की राजनीती के लिए बेहद डरावना कहा जा सकता है, क्योंकि यूपी वो प्रदेश है जिसपर भाजपा को बड़ा घमंड था, मोदी जी को बड़ा गर्व था लेकिन यूपी वालों ने सबको चकनाचूर कर दिया, यूपी के दो लड़के जिन्हें मोदी जी एक फ्लॉप जोड़ी कहते थे हिट हो गयी और आगे की राजनीती के लिए एक खतरा बन गयी. समाज में एक मज़ाक बहुत प्रचलित है, कहते हैं कि मौत पर रोने की बात नहीं, रोना तो इसलिए आ रहा कि मौत ने घर देख लिया। मतलब आज तो हम हारे ही लेकिन इस हार से आगे भी हार और बार बार हार का खतरा मंडराने लगा है और फौरी तौर पर ये खतरा प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में नज़र आने वाला है जो NDA और भाजपा की सवाल बन गए हैं. वैसे साख का सवाल तो सपा और इंडिया गठबंधन पर भी उठेगा।

ये सिर्फ 10 विधानसभा सीटों के चुनाव ही नहीं बल्कि 2027 के लिए एक संकेत भी हैं. यूपी की इन 10 सीटों पर जो भी नतीजे आएंगे उससे इसी साल तीन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी एक दिशा दिखेगी। यूपी की इन 10 सीटों पर अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन ने एकबार फिर लोकसभा वाली परफॉरमेंस दोहरा दी तो फिर मोदी जी के लिए एक खतरे की घंटी बज जाएगी, इन दस सीटों पर अपेक्षित कामयाबी से यकीनन कांग्रेस पार्टी और NDA में उसकी सहयोगी पार्टियों के हौसले बुलंद होंगे, वहीँ अगर योगी-मोदी की जोड़ी ने इन 10 सीटों पर डैमेज कंट्रोल में कामयाब हो गयी तो फिर वो कम से कम झारखण्ड और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में ज़रूर नए हौसलों के साथ जाएगी। यहाँ मैं महाराष्ट्र की बात नहीं कर रहा हूँ क्योंकि वहां की राजनीति सिर्फ भाजपा पर डिपेंड नहीं करती, वहां पर भाजपा के सहयोगी ही उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द हैं.

तो यूपी में एक और घमासान छिड़ने वाला है, एकबार फिर भाजपा और दो लड़कों के बीच महाजंग की तैयारी शुरू हो चुकी है. वैसे तो इन दस सीटों पर कांग्रेस पार्टी का कोई बड़ा दावा नहीं, जिन दस सीटों पर चुनाव होना है उनमें से पांच सीटें पहले से ही समाजवादी पार्टी के पास है, जिनमें अयोध्या और करहल की सीट सबसे महत्वपूर्ण है. करहल जहाँ से सपा प्रमुख अखिलेश यादव विधायक थे मगर अब केंद्र की राजनीती करने की ज़िमेदारी ले चुके हैं वही अयोध्या की सीट जहाँ पर मिली हार भाजपा के लिए इतना बड़ा नासूर है कि जो कभी भरा नहीं जा सकता। यहाँ पर अयोध्या-फैज़ाबाद लोकसभा की मिल्कीपुर विधानसभा सीट से विधायक अवधेश प्रसाद ने उस राम की नगरी में भाजपा के लल्लू सिंह को पराजित कर दिया जिसकी कल्पना भी शायद मोदी जी ने नहीं की होगी, खासकर रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद तो बिलकुल भी नहीं, इसी मुद्दे को लेकर तो शायद मोदी जी ने 400 + का नारा दिया था. तो इन दो सीटों के उपचुनाव सपा और भाजपा दोनों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बनेंगे। भाजपा हर हालत में कम से कम फैज़ाबाद की मिल्कीपुर सीट जीतकर पर अपने घाव पर मरहम लगाने की कोशिश ज़रूर करेगी। करहल में भी जीत हासिल कर वो व्यक्तिगत तौर अखिलेश यादव को झटका देना चाहेगी।

सपा के पास पांच सीटों के अलावा, भाजपा के पास तीन और उसकी सहयोगियों रालोद और निषाद पार्टी के पास एक एक सीट है. वैसे तो मुख्य चुनावों से उपचुनावों का मिज़ाज बिलकुल अलग होता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं होने वाला। इन सभी सीटों पर एक दिलचस्प मुकाबला होना तय है. NDA हो या फिर इंडिया दोनों ही इन चुनावों में अपना पूरा दम लगा देंगे। लोकसभा चुनाव में पूरी तरह साफ़ होने वाली बसपा जो उपचुनावों से हमेशा दूर रहती है, उसने भी मैदान में नई तैयारियों के साथ उतरने का फैसला किया है, यकीनन कई सीटों पर बसपा मुकाबले को और दिलचस्प बना सकती है, उधर नगीना लोकसभा सीट जीतकर यूपी में नए दलित चेहरे के रूप में उभरे चंद्रशेखर आज़ाद रावण ने इन उपचुनावों में भी कमर कसने का फैसला किया है. कांग्रेस पार्टी वैसे तो इन सभी सीटों में किसी पर भी अपना दावा नहीं ठोंक सकती लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली कामयाबी से हौसला पाकर वो भी अखिलेश यादव से एक दो सीटों की मांग कर सकती है. कांग्रेस पार्टी का प्रदेश नेतृत्व इसबारे में बयानबाज़ी भी करने लगा है, मिलकर चुनाव लड़ने की बातें हो रही हैं लेकिन देखना होगा कि अखिलेश यादव इन उपचुनावों में कांग्रेस को लेकर कितना बड़ा दिल दिखाते हैं, देखना होगा कि भविष्य की राजनीती को देखकर क्या समाजवादी पार्टी, कांग्रेस को कोई भागीदारी देगी ?

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