By: Dheeraj Upadhyaya
लखनऊ: यूपी विधानसभा (UP Vidhan Sabha) चुनाव अपने चुनावी चक्रव्यूह के अंतिम दौर के करीब पहुँच गया है। पूर्वांचल (Purvanchal) में होने वाले अंतिम दो चरणों में शेष 111 सीटें निर्णायक हो गयी है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यहीं पर उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh) की आगामी सरकार के बारे में निर्णय होगा। छठे और सातवें दौर में लड़ाई कांटे की होने के साथ ही जातियों की गोलबंदी भी देखने को मिलेगी। इस क्षेत्र में सपा-भाजपा से जातीय आधार पर जुड़े सामाजिक नेताओं की भी परीक्षा होगी जिन्हें लगता है की पूरी बिरादरी उनके पीछे खड़ी है।
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छठे चरण में 3 मार्च को होने वाले मतदान में कभी बसपा का गढ़ रहे अंबेडकरनगर को अगर छोड़ दे तो पूर्वांचल का यह क्षेत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के प्रभाव वाला माना जा रहा है। जिसमें मुख्यमंत्री की अपनी गोरखपुर विधानसभा सीट सहित जिन 10 जिलों की 57 सीटों पर मतदान होना है उनमें 2017 में भाजपा ने 46 सीटें जीती थीं। जबकि बसपा ने 5, सपा ने 2 और कांग्रेस केवल एक सीट पर सिमट गई थी। वहीं, भाजपा की सहयोगी अपना दल (एस), सुभासपा और निर्दलीय के हिस्से एक-एक सीट आई थी।
पूर्वांचल के इस चरण में पिछडा और दलित वोटर हमेशा की तरह इस बार भी निर्णायक साबित होने जा रहे हैं। हालांकि मुस्लिम + यादवों (Muslim+Yadav) की लामबंदी और जातीय समीकरणों के मजबूत प्रभाव के चलते कई सीटें पर कांटे की लड़ाई है तो दूसरी तरफ टिकट कटने के कारण बागी हुए कई चेहरे कई सीटों पर प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ाते दिख रहे हैं। इस क्षेत्र में असल चुनौती भाजपा और मुख्यमंत्री योगी के लिए है जिनके पाँच वर्ष के कार्यकाल के आधार पर उनका इम्तिहान होने वाला है।
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पिछड़ी जाति के कई दिग्गज नेताओं का भी होगा इम्तिहान
पूर्वांचल में ही जातीय आधार पर राजनीति करने वाले कई पिछड़ी जाति के दिग्गज नेताओं का इम्तिहान भी होगा। इनमें सबसे प्रमुख है सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर जिन्हें 2017 में 4 सीटें मिली थी लेकिन वो इस बार बीजेपी छोड़ सपा की साइकिल पर सवार है। वहीं भाजपा सहयोगी केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल (Union Minister Anupriya Patel) को भी यह साबित करना होगा की 2022 में भी उनके साथ ओबीसी खासकर कुर्मी वोटर खड़े है क्योंकि 2017 में अपना दल (एस) को 11 में से 9 सीटें मिली थी। जबकि इस बार उनके कोटें में 17 सीटें आयी है। वहीं पिछड़ों और दलितों के बीच अपने प्रभाव का दावा करने वाले संजय निषाद की ‘निषाद पार्टी’ पर दांव लगाते हुए भाजपा ने उन्हे 16 सीटों दी है। पूर्वांचल में किसका पलड़ा भारी है यह तो 10 मार्च को पता चलेगा लेकिन यह तय है यहाँ मुक़ाबला कांटे का है।

