सुनील शर्मा
देश के कई राज्यों में हुए चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों की मनमानी और कोविड प्रोटोकाॅल का उल्लंघन रोकने में विफल चुनाव आयोग को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। मद्रास हाईकोर्ट ने चुनावी राज्यों में बढ़ते कोरोना संक्रमण के लिये चुनाव आयोेग को जिम्मेदार ठकराते हुए उस पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की कड़ी टिप्पणी की है। इस टिप्पणी को गंभीरता से लेना चाहिये और कोर्ट को भी इस मामले में सख्त कदम उठाने चाहिये ताकि स्वायतशासी संस्था कहीं जाने वाली संस्थाओं को यह अहसास दिलाया जा सके कि उनकी पहली जिम्मेदारी और जबावदेही देश की जनता के प्रति है। वह किसी भी राजनीतिक दल की जेबी संस्था की तरह कार्य न करे और खुद को अन्य सरकारी संस्थाओं से अलग और अधिक जिम्मेदार भी समझे। लेकिन आवश्यकता इस बात की भी है कि माननीय कोर्ट, मनमानी कर चुनाव कराने, चुनावी रैलियों में कोरोना प्रोटोकाॅल का उल्लंघन करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाये। क्योंकि चुनावी महत्वकांक्षाओं की भेंट चढ़ी जिंदगियों के जिम्मेदार यह राजनीतिक दल भी हैं और हत्या की सजा पाने की हकदार भी।
हाल ही में देश और देेश के राजनेताओं के दो चेहरे देखने को मिले। देश का एक चेहरा वो देखने को मिल रहा है जिसमें हर दिन बढ़ते कोरोेना के आंकड़े जनता को भयभीत कर रहे हैं। अस्पतालों में अफरा-तफरी का महौल, मरीजों को भर्ती करने की मारामारी के बीच देखते ही देखते फुल हो गये बेड, मरीज को लेकर एक से दूसरे अस्पताल को भटकते तीमारदार, एक बेड दिलाने के लिये गुहार लगाते, रोते-बिलखते परिजन, अस्पतालों के बीच रास्ते में जान गंवाते मरीज, आंसूओं के सैलाब के साथ भाव-विह्वल कर देने वाला रूदन देखने को मिल रहा है। सारा देश देश रहा है कि जिन मरीजों को हम इलाज तक नहीं दिला पाये उनका अंतिम संस्कार करने के लिये श्मशान घाटों में जगह पाने के लिये भी टोकन लेना पड़ रहा है। घंटों इंतजार के बाद भी शवों का अंतिम संस्कार जमीन पर ही किया जा रहा है। भयावह हालात के बीच अपनों को इलाज तक न दिला पाने का दंश जीवन भर लोगों को सताता रहेगा। क्योंकि सरकार के लिये हर मौत सिर्फ एक आंकड़ा है मगर परिवार के लिये यह पूरे परिवार के लिये अपूरर्णीय क्षति है जिसकी भरपाई करने में न जाने कितन समय गुजर जायेगा।
देश का दूसरा चेहरा देखने को मिला उन राज्यों में जहां चुनावी पर्व की खुशियों में कोरोना न जाने कहां गुम हो गया। सड़कों पर लाखों की भीड़, जोश भरे नारों से गूंजते राज्य, तनाव-हिंसा के बीच सफल होती रैलियां जिन्हें देखकर सारा देश डर रहा था मगर न रैलियों में आने वालोें को कोई चिंता थी और न ही रैलियों में बुलाने वाले नेताओं को कोई फिक्र। सारा देश चिल्ला रहा था कि चुनाव को रोको, रैलियों पर लगाम लगाओ, लेकिन लोग बेखौफ थे और नेता बेफिक्र। चुनावी जोश में चुनाव आगे बढ़ता गया और इसी के साथ कोरोना भी।
इसी दौरान देश के नेताओं के भी दो चेहरे देखने को मिलेे और समझ नहीं आया कि कौन सा चेहरा असली है, कौन सी बात सही है। देश को संबोधित करते हुए नेता बढ़ते कोरोना संक्रमण पर चिंता जताते, सबको माॅस्क पहनने, सामाजिक दूरी बरतने का पालन करने की अपील करते। न मानने पर सख्ती बरतने और लाॅकडाउन लगाने की चेतावनी देते हुए भी कई बार देखा। मगर वही नेता चुनावी राज्यों में रैलियों के दौरान एक बार भी मास्क पहनने या सामाजिक दूरी बनाये रखने की अपील करते हुए दिखाई नहीं दिये। बल्कि चुनावी राज्यों मेें वह मतदाताओें से चुनावी महापर्व में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील करते रहे। रैलियों में ज्यादा से ज्यादा संख्या में भाग लेने की अपील करते दिखे। अब उनकी कौन की अपील सही है, कौन सी देशवासियों के हित में है यह समझ ही नहीं आया और चुनाव लगभग हो ही गया है।
निःसंदेह चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारियों को निर्वहन करने में नाकाम रहा है। कानूनी तौर पर तो शायद संभव न हो सके लेकिन नैतिक तौर पर चुनाव में कोरोना प्रोटोकाॅल का पालन न कराये जाने के कारण राज्यों में बढ़ने वाले कोरोना केस और मौतों के लिये चुनाव आयोग अवश्य जिम्मेदार है। यदि माननीय कोर्ट चुनाव आयोग के खिलाफ सख्त कदम उठाये तो यह नजीर बनेगा। लेकिन असली जिम्मेदार यानी राजनीतिक दलों को भी बख्शा नहीं जाना चाहिये। जिन नेताओं ने विशाल रैलियां आयोेजित कर अपना 56 इंच का सीना सबको दिखाया है उनको सख्त सबक सिखाना जरूरी है ताकि लोगों की लाश पर चढ़कर सत्ता सिंहासन तक पहुंचना नजीर न बन सके। लेकिन क्या ऐसा हो सकेगा…

