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तेलंगाना ने रखा कांग्रेस के ज़ख्मों पर मरहम

आर्टिकल/इंटरव्यूतेलंगाना ने रखा कांग्रेस के ज़ख्मों पर मरहम

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अमित बिश्‍नोई

पांच राज्यों के सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए किसी भूकंप से कम नहीं। मध्य प्रदेश जहाँ उसे सौ फ़ीसदी वापसी का यकीन था, लोग भी यही कह रहे थे, छत्तीसगढ़ जहाँ कांग्रेस के साथ ही किसी को भी भाजपा के आने का भरोसा नहीं था, भाजपा के गुजरात मॉडल की तरह भूपेश बघेल के छत्तीसगढ़ मॉडल की चर्चा हो रही थी, कांग्रेस पार्टी भूपेश बघेल के कामों को आधार बनाकर चारों राज्यों में चुनाव लड़ रही थी यहाँ तक छत्तीसगढ़ की चर्चा राहुल और प्रियंका राजस्थान में भी कर रहे थे जहाँ अशोक गेहलोत की अपनी चिरंजीवी जैसी योजनाओं ने धूम मचा रखी थी ऐसे में इन तीनों राज्यों में बुरी तरह मिली हार ने कांग्रेस पार्टी को झकझोर कर रख दिया, भारत जोड़ो यात्रा से राहुल और कांग्रेस के पक्ष में जो लहर बनती दिखी थी उसपर सवालिया निशान लगता दिख रहा है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में तो भारत जोड़ो यात्रा को ज़बरदस्त रेस्पॉन्स भी मिला था, यकीनन ये नतीजे कांग्रेस पार्टी के साथ ही बहुत से लोगों की समझ में नहीं आ रहे हैं लेकिन नतीजे तो नतीजे ही हैं. अलबत्ता कांग्रेस पार्टी के लिए तेलंगाना से अच्छी खबर ज़रूर आयी है जिसने कांग्रेस पार्टी के ज़ख्मों पर मरहम रखने का काम किया है।

तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी को बहुमत मिला है, इसका मतलब ये हुआ कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए दक्षिण में दोबारा एक द्वार और खुला है. यकीनन कांग्रेस पार्टी के भविष्य के लिए उम्मीद की एक किरन जगी है. ऐसे में जब हिंदी राज्यों में वो कुछ ख़ास नहीं कर पा रही है, दक्षिण के राज्यों में पकड़ बढ़ाना उसके लिए एक शुभ संकेत है. दक्षिण में कभी कांग्रेस पार्टी का राज हुआ करता था. आंध्र प्रदेश तो कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, दक्षिण ने हमेशा कांग्रेस के बुरे समय में उसका साथ दिया, इमरजेंसी के समय भी कांग्रेस पार्टी को दक्षिण से सहारा मिला था, जिसमें आंध्रा प्रदेश का बड़ा हाथ था. 10 बरस पहले जब कांग्रेस की हुकूमत में तेलंगाना राज्य वजूद में आया, आंध्र प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की ही सरकार थी. आंध्रा को तोड़कर तेलंगाना बनाने का खामियाज़ा भी कांग्रेस को भुगतना पड़ा. कांग्रेस के हाथ से आंध्र प्रदेश भी गया और तेलंगाना भी. कांग्रेस ने सोचा था कि आंध्र प्रदेश के लोगों की नाराज़गी तेलंगाना में सरकार बनाकर पूरी हो जाएगी लेकिन तेलंगाना आंदोलन चलाने वाले KCR ने सोनिया और कांग्रेस को धोखा दिया और वादे से पलट गए, पार्टी बनाकर अकेले चुनाव लड़ा और जीतकर मुख्यमंत्री बन गए. कांग्रेस के हाथ से आंध्रा भी गया और तेलंगाना भी.

लेकिन दस बरस बाद कांग्रेस पार्टी अब जाकर तेलंगाना के लोगों को ये समझाने में कामयाब हुई कि दरअसल तेलंगाना KCR की नहीं कांग्रेस की देन है, सोनिया गाँधी की देन है. दस बरस बाद कांग्रेस तेलंगाना के लोगों को ये याद दिलाने में कामयाब हुई कि यहाँ के लोगों के साथ इंदिरा गाँधी के कितने गहरे सम्बन्ध थे। दस बरस बाद वो रेवांता रेड्डी के रूप एक जुझारू नेतृत्व पैदा कर सकी जिसने मुर्दा पड़ी कांग्रेस में जान फूंकी, कांग्रेस पार्टी जो कुछ महीने पहले तक तेलंगाना में तीसरे नंबर की पार्टी थी, रेवांता रेड्डी के युवा और आक्रामक नेतृत्व की वजह से चमत्कारिक रूप से पहले नंबर पर पहुँच गयी. देखा जाय तो कांग्रेस पार्टी ने तेलंगाना में सबसे अच्छा इलेक्शन लड़ा क्योंकि यही एक राज्य था जहाँ वो सबसे ज़्यादा कमज़ोर थी। मध्य प्रदेश में उसे वापसी का यकीन था, छत्तीसगढ़ को हारने के बारे में सोचा ही नहीं था, राजस्थान के बारे में ज़रूर टक्कर की बात हो रही थी.

तेलंगाना में KCR सरकार के खिलाफ किसी भी तरह की नाराज़गी भी ख़ास नहीं थी मगर लोगों को कांग्रेस पार्टी ये समझाने में कामयाब रही कि जिस पार्टी की वजह से उन्हें तेलंगाना मिला उसे मौका ज़रूर मिलना चाहिए। पड़ोस के कर्नाटक में मिली विजय ने भी तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी के लिए माहौल बनाने का काम किया। कर्नाटक सरकार के अधिकाँश मंत्रियों ने तेलंगाना में डेरा डाला। कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी द्वारा किये चुनावी वादों को पूरा करना भी एक बड़ी वजह बना, लोगों को यकीन हुआ कि कर्नाटक की तरह तेलंगाना में भी कांग्रेस पार्टी सत्ता में आकर अपने चुनावी वादे या गारंटियां ज़रूर पूरी करेगी। कहा जाय तो तेलंगाना के नतीजों ने कांग्रेस पार्टी को पूरी तरह टूटने से बचा लिया और 24 के चुनावों के लिए हलकी ही सही मगर उम्मीद को बरकरार रखा है।

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