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भाजपा के गढ़ में सेंध लगा रही सपा, टीपू की रणनीति पास होगी या फेल

आर्टिकल/इंटरव्यूभाजपा के गढ़ में सेंध लगा रही सपा, टीपू की रणनीति पास...

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पारुल सिंघल

2014 और 2019 के विधान सभा चुनावों में करारी हार का सामना कर चुके समाजवादी पार्टी के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की रणनीति आम लोकसभा चुनाव 2024 में सबका ध्यान खींच रही है। नामांकन होने के बावजूद प्रत्याशी बदलने की बात हो या इंडिया गठबंधन में उनकी भागीदारी या उत्तर प्रदेश में प्रत्याशियों का चयन, अखिलेश यादव ने अपना पूरा पैटर्न बदल डाला है। यही नहीं किसी मंझे हुए खिलाड़ी की तरह अपनी इसी रणनीति से उन्होंने यूपी में भाजपा की नींव भी हिला दी है। चुनावी विश्लेषक बताते हैं कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भाजपा के कई इलाकों में सेंध मारी है। भाजपा के गढ़ कहे जाने वाले इलाकों में लोगों ने आश्चर्य जनक रूप से सपा को वोट किया है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस बार समाजवादी पार्टी काफी मजबूती से चुनाव लड़ रही है। जिस तरह से उन्होंने अपनी पकड़ प्रदेश में मजबूत की है उसके बाद भाजपा के 400 पार के नारे को गठबंधन बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है।

समाजवादी पार्टी का चुनावों में टिकट बांटने का पैटर्न भी इस बार पूरी तरह से बदला है। यादव और मुसलमान को टिकट देने वाली पार्टी ने इस बार जातीय समीकरण और सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाते हुए टिकट का वितरण किया है। इन चुनावों में सपा ने यादव और मुसलमान पार्टी होने का टैबू तोड़ा है। लोक सभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी इंडिया गठबंधन के साथ उत्तर प्रदेश में 63 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। गौर करने वाली बार ये है की इन सभी सीटों पर सपा का जातीय समीकरण पूरी तरह से बदला हुआ है। पिछले चुनावों के मुकाबले सबसे कम टिकट यादव और मुसलमानों को दिये गए हैं।

अखिलेश यादव ने इन चुनावों में भाजपा को परास्त करने के लिए अपनी चुनावी रणनीति को इस तरह तैयार किया है कि भाजपा के गढ़ में ही वह उन्हें मात दे सके। समाजवादी पार्टी ने कई सीटों पर उसी समाज के प्रत्याशी को टिकट दे डाला है जो समाज भाजपा का परंपरागत वोटर माना जाता रहा है। ऐसा करके पार्टी ने भाजपा के कोर मतदाताओं को तोड़ने का प्रयास किया है। मसलन मेरठ हापुड़ लोक सभा सीट पर तीन बार प्रत्याशी बदलने वाली समाजवादी पार्टी ने अंत में दलित समाज की सुनीता वर्मा को टिकट दिया। इस रणनीति के पीछे इस सीट पर उनका मकसद मुसलमान और दलित समाज को साधना था। दोनों ही समुदाय पर मजबूत पकड़ रखने वाली प्रत्याशी ने काफी हद तक इस फार्मूले पर कामयाबी पाने का प्रयास भी किया। देखा गया की मुस्लिम बहुल इलाकों में इस सीट पर सबसे अधिक वोट डला। अपनी इस रणनीति को सपा सरकार ने पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किया है। पार्टी में काफी सोच समझकर दलित और पिछड़ी जाति के प्रत्याशी भी मैदान में उतारे हैं। जिसका सीधा मकसद भाजपा और बसपा के वोटर को अपनी तरफ खींचना है।

सपा ने प्रदेश में ठाकुरों को भाजपा से चल रही नाराजगी का भी पूरा फायदा उठाया है। कांग्रेस को कभी वोट न देने वाले ठाकुरों ने भी इस बार समाजवादी पार्टी के साथ इंडिया गठबंधन में शामिल कांग्रेस को वोट देने में कोई हिचक नहीं दिखाई । ठाकुरों का काफी वोट गठबंधन को मिल रहा है। भाजपा से उनके कार्य कर्ताओं ने भी नाराजगी दिखाते हुए गठबंधन को मजबूती दिलाई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस रणनीति के चलते ही गठबंधन भाजपा का 30 से 35% वोट झटकने में कामयाब हो सकती है। जातीय ध्रुवीकरण से भी सपा ने मुस्लिम वोट को अपनी तरफ खींचा है। दलित प्रत्याशियों के जरिए बसपा के वोटर को तोड़ने का काम भी सपा ने बखूबी किया है।

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