स्मार्ट ओपिनियन पोल्स और लाचार के. चु. आ.

उत्तराखंडस्मार्ट ओपिनियन पोल्स और लाचार के. चु. आ.

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स्मार्ट ओपिनियन पोल्स और लाचार के. चु. आ.

अमित बिश्‍नोई

एक कहावत है, “तू डाल डाल मैं पात पात”. और यह उत्तर प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनावों के लेकर मीडिया हॉउसों द्वारा करवाए जा रहे ओपिनियन पोल्स पर बिलकुल खरी उतरती है. हमारे देश में नियम कानून बनते हैं तोड़ने के लिए न कि पालन करने के लिए और इन चुनावों में यह मीडिया हाउस खुले आम चुनाव आयोग के नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं. इन्हें इसकी बिलकुल भी नहीं परवाह कि चुनाव आचार संहिता नाम की भी कोई चीज़ होती है.

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यह सब हो रहा और खुले आम हो रहा है, बस उसका स्वरुप थोड़ा बदला हुआ है. अब वह सीधा सीटों की बात नहीं करते बल्कि सीटों की बात, सत्ता में कौन आ रहा है, सरकार कौन बनाने जा रहा है, कौन सा मुख्यमंत्री लोकप्रिय है, इन सवालों के ज़रिये की जा रही है. यह सर्वे कभी “जनता का मूड” से होते हैं तो कभी “सिंघासन पर कौन” के नाम से. ऐसे बहुत से शीर्षक हैं जिनका इस्तेमाल कर के चुनाव आयोग के नियमों का मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है.

एक मीडिया हाउस है जो रोज़ सर्वे करता है, फलां पार्टी में कोई शामिल हुआ, सर्वे आता है कि मुलायम की बहू भाजपा में, सपा पर क्या इसका पड़ेगा असर. इतने प्रतिशत, हाँ पड़ेगा। इतने प्रतिशत ‘नहीं पड़ेगा’. बाक़ी जो बचे, बोले कह नहीं सकते। कहने का मतलब, इनके पास हर बात का सर्वे है, यह अब यह डायरेक्ट नहीं इनडायरेक्ट सवाल पूछते हैं. इनका सवाल होता है यूपी में मुख्यमंत्री के रूप पहली पसंद कौन?. फिर यह बताते हैं कि पिछले सर्वे में इतने प्रतिशत लोकप्रियता थी, उससे पहले इतनी और अब इतनी। मतलब वोटर को सीधे सीधे समझाया जाता है कि सरकार तो फलां पार्टी बना रही है.

एक और टीवी चैनल है जो अपने आपको सबसे तेज़ कहता है उसका अंदाज़ तो और भी निराला है. चुनाव चल रहे हैं उत्तर प्रदेश के और सर्वे हो रहा कि आज लोकसभा के चुनाव हों तो भाजपा सरकार फिर बनने की सम्भावना कितनी। नियमों के हिसाब से भले ही यह सर्वे कुछ गलत न लग रहा हो मगर सब जानते हैं इस तरह के “जनता के मूड” का क्या मतलब होता है और यह मीडिया हाउस चुनाव में किसकी मदद करते हुए नज़र आ रहे हैं. एक और बड़ा मीडिया हाउस है जिसके चुनावी रथ को झंडी मुख्यमंत्री दिखाते हैं, चुनाव आचार संहिता लगने के बावजूद। यह भी सर्वे करने में बड़े माहिर हैं, इसपर भी चुनाव आयोग जैसी संस्था के होने या न होने का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

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दरअसल अप्रत्यक्ष ओपिनियन पोल्स के बहाने चुनाव को प्रभावित करने का यह जो स्मार्ट खेल चल रहा है उससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठता है, उसकी लाचारी पर प्रश्न चिन्ह लगता है. एक संवैधानिक संस्था को निकम्मा और नाकारा साबित करता है. उसे केंद्रीय चुनाव आयोग से के चु आ के रूप में स्थापित करता है, बिना रीढ़ वाला। वैसे भी पिछले कई सालों में निर्वाचन आयोग की अपनी कार्यशैली ने उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल किया है. नाम को तो वह स्वतंत्र संस्था है लेकिन वाकई ऐसा है, इसपर सवाल है. पहले पूरे देश का चुनाव भी सात-आठ चरणों में नहीं होता था अब एक प्रदेश का चुनाव सात चरणों में होता है. क्यों ऐसा होने लगा, सभी को मालूम है. मौजूदा चुनाव में आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में उसका कैसा रवैया है सबके सामने है. इन उल्लंघनों के आगे यह ओपिनियन पोल्स तो कुछ भी नहीं, मगर यह मीडिया हाउस इन सर्वेक्षणों के ज़रिये चुनाव को अपने तौर पर प्रभावित करने की, एक पार्टी विशेष के लिए छवि बनाने की स्मार्ट कोशिश तो कर ही रहे हैं और लाचार चुनाव आयोग मूकदर्शक बना सब कुछ देख रहा है. बेचारा!

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