Zeba Hasan
उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे बदायूं में यू तो कई चीजें मशूहर हैं लेकिन जिस हस्ती ने बॉलिवुड के आसमान पर इस कस्बे का नाम लिख दिया है वह है शकील बदायूंनी (Shakeel Bdayuni)। जब प्यार किया तो डरना क्या…, ना जाओ सैंया छुड़ा के बइंया…,हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं…, सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब आओगे… और ऐ मोहब्बत तेजे अंजाम पर रोना आया…ऐसे कई प्यार और दर्द भरे गीत हैं जिन्हें लिखकर शकील ने फिल्मी संगीत को अमर बना दिया है। बदायूं से बॉलिवुड तक का सफर तय करने वाले शकील अहमद बदायूनीं ने आज ही के दिन यानी 20 अप्रैल सन 1970 को इस दुनिया को अलविदा कहा था। शकील को श्रृधांजलि देते हुए पेश है शकील बदायूंनी की जिंदगी से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से।
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शकील को पढ़ी जब डांट
चौदवीं का चांद हो या आफ ताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो…वहीदा रहमान पर फिल्माया गया चौदवीं का चांद फिल्म का यह गीत आज भी हुस्न के कद्रदान गुनगुनाते हैं। ब्लैक एंड वाइट फिल्मों के दौर का यह गीत आज भरी प्यार करने वालों के दिलों में रोशनी जगा देता है। लेकिन यह शायद ही किसी को मालूम हो कि इस गीत को लिखने वाले शकील को भरी महफिल में किसी ने शेर के गलत होने की वजह से खरी खोटी सुना दी थी। जी हा यह बात है एक महफिल की जहां हजरत तातिक गुलाम भी थे। जैसे ही शकील को देखा नातिक बोले कि तुम्हारे पिता और चाचा शायर थे, तुम फिल्मी लाइन में जाते ही शायरी के नियम भूल गए। नातिक की इस डांट पर शकील ने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा कि आप मुझे मेरी गलती तो बताएं मैं दुरुस्त कर लूंगा। इस पर नातिक बोले कि अब क्या दुरुस्त कर लोगे अब तो रिकार्ड हो गया है और रेडियो पर बजते हुए मैनें सुन भी लिया है। फिर नातिक शकील से कहते हैं कि आप जरा गौर फरमाइए आपने लिखा है कि चौदवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम ला जवाब हो…यहां पहली लाइन में एक शब्द कम है। शायरी का मीटर यहां पर ठीक नहीं है। पहली लाइन में अगर तुम शब्द जोड़ देते तो ठीक होता। इस पर शकील ने उन्हें काफी समझाना चाहा की कई बार फिल्मी गीतों में शायरी का मीटर बदल जाता है लेकिन वह अपनी बात पर अटल ही रहे।
बेगम अख्तर और शकील की गजल
ये किस्सा है मशहूर गायिका बेग़म अख्तर और शकील शकील बदायूंनी की दोस्ती का। ये किस्सा शकील बदायूंनी द्वारा लिखी ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पर रोना आया’ को लेकर है। हुआ यूं था की बेग़म साहिबा अपने एक मशहूर कंसर्ट के लिए बॉम्बे गईं थीं और उनके साथ उनकी शिष्या शांति हीरानंद भी उनके साथ थी जिन्हें वो प्यार से बिट्टन कहती थीं। उस दौर में साठ के दशक में तमाम सारे नए नए रेडियो खुल रहे थे और हर जगह इनॉगरल कंसर्ट के लिए अक्सर बेग़म अख़्तर को बुलाया जाता था तो इसी तरह की एक वाक्या से सम्बंधित एक कंसर्ट करने के लिए वो बम्बई गईं और बंबई से जब वो चलने लगीं बॉम्बे स्टेशन पर उनसे मिलने शक़ील साहब आये शकील साहब ने बाहर से कुशल क्षेम पूछा और एक कागज़ मोड़ कर के बेग़म साहिबा को खिड़की के माध्यम से दिया उन्होंने कहा आपके लिए गज़ल कही है इसे आराम से पढ़िएगा और जब तक उन लोगों में और कुछ बातें होती ट्रेन आगे बढ़ गयी।”
जैसा की उस ज़माने में भी चौबीस घंटे लगते थे बंबई से लखनऊ आने में रात में बेगम साहिबा को नींद आ गयी वो सो गयीं सुबह बहुत तड़के भोर में चाय पीते हुए अचानक बेगम साहिबा बोलीं “बिट्टन ज़रा निकालो तो वो कागज़ वो कहां रख दिया तुमने जो कल रात मैंने तुम्हे दिया था देखें शकील साहब ने क्या लिखा है।” उन्होंने गज़ल पढ़ी और मुझे थमाते हुए जल्दी से अपना हारमोनियम निकाल मुझसे गज़ल के बोल पढ़ने को बोला और ख़ुद धुन देती गयीं। शकील बदायूं की हस्तलिखित गज़ल जो बाद में चलकर बहुत मशहूर हुई।
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नौशाद के साथ कीं सबसे ज्यादा काम
3 अगस्त 1916 को बदायूं में जन्में शकील के पिता मोहम्मद जमाल अहमद कादरी चाहते थे कि उनका बेटा बेहतर तैयार हो। अलीगढ़ से बी.ए. पास करने के बाद वर्ष 1942 मे शकील दिल्ली पहुंचे जहाँ उन्होंने आपूर्ति विभाग में आपूर्ति अधिकारी के रूप में अपनी पहली नौकरी की। इस बीच वह मुशायरों में भी हिस्सा लेते रहे जिससे उन्हें पूरे देश भर में शोहरत हासिल हुई। अपनी शायरी की बेपनाह कामयाबी से उत्साहित शकील बदायूँनी ने आपूर्ति विभाग की नौकरी छोड़ दी और वर्ष 1946 में दिल्ली से मुंबई आ गये।मुंबई में उनकी मुलाकात उस समय के मशहूर निर्माता ए.आर.कारदार उर्फ कारदार साहब और महान् संगीतकार नौशाद से हुई। यहाँ उनके कहने पर उन्होंने ‘हम दिल का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की आग लगा देंगे…’ गीत लिखा। यह गीत नौशाद साहब को काफ़ी पसंद आया जिसके बाद उन्हें तुरंत ही कारदार साहब की दर्द के लिये साईन कर लिया गया। उन्हे फिल्म दर्द के गीत लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। फिल्म के सारे गीत हिट रहे और फिर उन्होने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बैजु बावरा, मदर इंडिया, मुगले आजम, चौदहवी का चाँद , साहब बीवी और गुलाम जैसी फिल्मों के गानों से लोगों को दीवाना बना दिया। शकील बदायूँनी की मृत्यु 54 वर्ष की उम्र में 20 अप्रैल 1970 को हुई।

