नई दिल्ली। जजों के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज बड़ा निर्णय लिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही महासचिव से जजों के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामले में जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने महासचिव से मौजूदा और सेवानिवृत्त जजों के खिलाफ यौन उत्पीड़न मामलों में जांच तंत्र से संबंधित एक मामले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति एएस ओका और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने इस मसले पर आज सुनवाई की। पीठ ने महासचिव को इस मसले पर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। पीठ ने इस मामले की सुनवाई के लिए 15 नवंबर की तारीख तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वह न्यायिक अधिकारियों और वर्तमान तथा सेवानिवृत्त जजों के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच के लिए प्रणाली बनाने की याचिका पर 15 नवंबर को सुनवाई करेगा। न्यायमूर्ति एसके कौल की अध्यक्षता वाली इस पीठ ने शीर्ष अदालत के महासचिव से इस मामले के बारे में न्यायपालिका द्वारा अपनाई जा रही मौजूदा प्रणाली पर उनका रुख रखने के लिए कहा है। याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत में कहा कि वह मामले में कुछ और सामग्री रखना चाहती हैं। पीठ में न्यायमूर्ति एएस ओका और न्यायमूर्ति विक्रमनाथ शामिल रहे। पीठ ने इस मसले में निर्देश देने के लिए 15 नवंबर की तारीख आज तय की है। जयसिंह ने पीठ से कहा कि शीर्ष अदालत ने याचिका में एक आवेदन पर पहले भी नोटिस जारी किया था। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि शीर्ष अदालत के महासचिव इस मुद्दे पर अदालत के सामने अपना रुख स्पष्ट रूप से रखें।
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पीठ ने शीर्ष अदालत के महासचिव की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि जयसिंह कह रही हैं कि जहां तंत्र का संबंध है। मामले में कुछ प्रगति हुई है। पीठ ने कहा कि उनके अनुसार, आप जिस तंत्र का पालन करते हैं उसे रिकॉर्ड में रखना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि याचिका प्रतिवादियों में से दो पार्टियों के समूह को हटाया जा सकता है क्योंकि उनके खिलाफ किसी राहत का दावा नहीं किया गया।

