अमित बिश्नोई
मुफ्त में मिली चीज़ का मज़ा ही कुछ और होता है. फ्री में अगर कहीं भी कुछ भी मिल रहा हो तो यह बात जंगल में आग की तरह फ़ैल जाती है और लोगों का हुजूम आनन फानन वहां पहुँच जाता है. फ्री में अगर एक चीज़ मिल जाय तो लोगों के मन में बात यही होता है कि काश फ्री में दो मिल जाय. लोगों की इसी मानसिकता को देखते हुए सेल और ऑफर का सिलसिला भी शुरू हुआ जो बिजनेस बढ़ाने का एक कामयाब तरीका बन गया है. यह सब देखकर राजनीतिक पार्टियों ने इस कामयाब नुस्खे को आज़माना शुरू किया और फिर शुरू हुआ मुफ्त बांटने की चुनावी राजनीति का सफर या ऐसा भी कह सकते हैं कि लोगों को सरकारी तौर पर मुफ्तखोर बनाने का सफर. इसका ताज़ा नमूना 25 दिसंबर को लखनऊ के इकाना क्रिकेट स्टेडियम में देखने को मिला जब प्रदेश सरकार ने छात्र और छात्रों या फिर कहिये युवा वोटरों को लुभाने के लिए 60 हज़ार टैबलेट और स्मार्ट फोन्स का वितरण किया।
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मुख्यमंत्री योगी जी के मुताबिक उनकी सरकार नौजवानों को तकनीकी दृष्टि से सशक्त बनाना चाहती है. बात तो बहुत अच्छी है मगर जब इस सशक्तिकरण की शुरुआत ठीक चुनाव से पहले होती है तो इतनी अच्छी बात, इतनी अच्छी सोच भी अप्रभावी और घटिया लगने लगती है. हालाँकि यह कोई पहली बार नहीं हुआ, योगी जी ने कोई नई बात नहीं की, दूसरी सरकारें, पार्टियां और नेता भी ऐसा करते आये हैं. ज़्यादातर सत्तारूढ़ सरकारें इस तरह के मुफ्त ऑफरों की शुरुआत ठीक चुनाव से पहले ही करती हैं.

वोटरों के लिए चुनावी ऑफरों की शुरुआत संभवतः दक्षिण के राज्यों से शुरू हुई और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो तमिलनाडु की अम्मा यानि स्वर्ग सिधार चुकी जयललिता ने इसको एक चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया था। फिर धीरे धीरे अन्य पार्टियों को भी यह सब भाने लगा. मुफ्त या कम कीमत पर अनाज से शुरू हुआ यह सफर मुफ्त लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्टफोन और स्कूटी तक पहुँच चूका है. पहले भी जनता से लुभावने वादे किये जाते थे, वह भी एक तरह से ऑफर ही होते थे, लेकिन उन वादों में कहीं न कहीं भविष्य मज़बूत होने की बात होती थी. लेकिन अब समय बदल गया है, लोग भविष्य पर नहीं वर्तमान पर भरोसा करते हैं, ज़्यादा भौतिकवादी हो गए, जो देना हो, फ़ौरन दे दीजिये। और सत्तारूढ़ सरकारों को भी यह सूट करने लगा है, विपक्षियों की मज़बूरी होती है, वह लोगों को आने वाले ज़बरदस्त ऑफर तो ज़रूर दे सकते हैं मगर भौतिक रूप से सत्तारूढ़ दल ही एल्क्ट्रॉनिक गैजेट्स जैसी ज़रूरतों को पूरा कर सकती हैं.
यूपी चुनावों को लेकर अगर पार्टियों के चुनावी ऑफरों की बात करें तो सबसे आकर्षक ऑफर तो कांग्रेस के लगते हैं मगर जनता को भी मालूम है कि यह वह ऑफर हैं जो फिलहाल कांग्रेस पार्टी पूरे नहीं कर सकती। समाजवादी के ऑफर आने अभी बाक़ी हैं हालाँकि पिछली बार वह भी इसी तरह के ऑफर लाई थी जो सत्ता तक उसे पहुँचाने में काफी मददगार हुए थे, फिलहाल वह अभी गठबंधन की राजनीति में ही बिज़ी है. सत्तारूढ़ भाजपा ने शुरुआत कर ही दी है, 60 हज़ार टैबलेट और स्मार्ट फोन्स बाँट दिए हैं, एक करोड़ बांटने हैं. आने वाले दिनों में वह कुछ और ऑफर भी ला सकती है क्योंकि सबसे अधिक साधन संपन्न वही पार्टी है.

अब एक बड़ा सवाल यह उठता है कि इस तरह के ऑफरों का भरपूर फायदा उठाने वाले वोटर बदले में राजनीतिक पार्टियों को क्या वह रिटर्न गिफ्ट देते हैं जिसके लिए उन्होंने वो उपहार दिए. कल इकाना में मौजूद नौजवानों की भीड़ के चेहरों पर टैबलेट और स्मार्टफोन्स को पाने की ख़ुशी थी मगर वह ख़ुशी मुफ्तखोरी की थी. उनकी बातों से ऐसा कतई नहीं लगा कि इस फ्री गिफ्ट के बदले वह रिटर्न गिफ्ट देने वाले हैं, कहने का मतलब यह कि रिटर्न गिफ्ट मिलेगा ही इसकी कोई गारंटी नहीं। फिर भी उम्मीद पे दुनिया कायम है. भाजपा सरकार सत्ता में वापसी के लिए जहां दूसरे तमाम हथकंडे अपना रही है, एक यह भी सही.
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लोगों को मुफ्तखोर बनाने की राजनीतिक पार्टियों की यह आदत बड़ी ही घातक है, यह पार्टियां खुलेआम वोटरों को बिकाऊ समझती हैं और चुनाव आते ही सेल लगा देती हैं जिनमें एक से बढ़कर एक ऑफर होते हैं. एक खेल शुरू होता है वोटों की खरीद फरोख्त का. चुनाव आयोग भी सेल के इस खेल को मूक दर्शक बनकर देखता रहता है. अफ़सोस इस बात का होता है कि वोटर भी अपने को बिकाऊ साबित करता है.

